श्री ललित माधुरी जी की जीवनी

श्री ललित माधुरी जी की जीवनी

जन्म :
श्री ललित माधुरी जी का जन्म 1828 के माघ शु० 14 को लखनऊ में हुआ। इनके पितामह शाह बिहारीलालजी उस समय लखनऊ में प्रसिद्ध धनाढ्य थे। नवाबों से उनको “शाह" उपाधि प्राप्त थी। उनके ज्येष्ठ पुत्र साह गोविंदलालजी की द्वितीय पत्नी के गर्भ से आपका जन्म हुआ। आपका नाम शाह फुंदनलाल हुआ। इनके बड़े भ्राता का नाम शाह कुंदनलाल (ललित किशोरी) था।

बाल्यकाल एवं शिक्षा :
श्री ललित माधुरी जी अपने बड़े भ्राता शाह कुन्दनलाल जी से बहुत प्रेम करते थे। दोनों भ्राताओं में राम लक्ष्मण जैसी प्रीति थी। दोनों को एक सी ही शिक्षा दी गई। दोनों ही अच्छे कवि थे, दोनों एक साथ ही रहते थे। बाल्य काल में दोनों भाइयों को फारसी की शिक्षा दी गई। दोनों तीक्ष्ण बुद्धि  सम्पन्न थे अतः शीघ्र ही फारसी में अच्छे प्रवीण हो गये। कुछ दिन तक ये हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, बांग्ला आदि भाषाएं पढ़ते रहे और उसमे भी प्रवीण हो गए।

बड़े भ्राता के आज्ञाकारी :
श्री ललित माधुरी जी अपने बड़े भाई के बड़े आज्ञाकारी थे। एक बार श्री ललित माधुरी जी को ज्वर आया, ज्वर के साथ प्यास का तो चोली दामन का सा सङ्ग है ही। इन्होंने कई बार ठण्डा पानी पिया। बड़े शाहजी साहब ने सुना तत्र उनसे कहा कि "भाई ज्वर में पानी पीना ठीक नहीं है" तभी से इन्होंने पानी पीना छोड़ दिया। यह संध्या समय की बात है। श्री ललित माधुरी जी ने दूसरे दिन तक पानी नहीं पिया। 14 घंटे में इनकी हालत बड़ी ख़राब हो गई। सवेरे शाहजी साहब ने बड़े चिन्तित होकर इसका कारण पूछा तो श्री ललित माधुरी जी चुप हो गये। इनके अनुचरों ने कहा कि जबसे आपने मना किया तबसे इन्होंने जल नहीं पिया सम्भवत: इसी से गुफलत सी हो गई है। बड़े शाहजी साहब ने उसी समय हकीम को बुलवाया। हकीम ने देख कर कहा कोई चिन्ता की बात नहीं है, केवल जल न पीने से ही यह अवस्था हुई है। इन्हें जल पिलाइये, यदि ये तीन चार घण्टे और जल न पीते तो "पीलिया" रोग हो जाता। श्री ललित माधुरी जी का यह अग्रजाज्ञा पालन सभी को अनुकरणीय है। इनकी भगवन् निष्ठा, साहस, निर्भयता भी प्रसंशनीय है।

प्रथम वृन्दावन आगमन :
श्री ललित माधुरी जी अपने बड़े भ्राता श्री ललित किशोरी जी के संग 1849 के लगभग श्रीधाम वृन्दावन दर्शनों को आये थे। इनके पितामह शाह बिहारी लाल जी ने अपने इष्टदेव श्री राधारमण जी का नूतन मंदिर बनवाया था। जब से मंदिर बना तब से पितामह शाह बिहारी लाल जी उसे देखने को वृन्दावन नहीं आये थे। ये दोनों भाई बाल्यकाल से दी बड़े भक्त थे अतः इन दोनो को मंदिर देखने वृन्दावन भेजा गया। इनको वृन्दावन स्थान बड़ा सुन्दर लगा और इनकी इच्छा यहीं रहने की हुई, किन्तु उस समय ऐसा असंभव था, उस समय तक इनके पितामह इत्यादि जीवित थे। लगभग एक मास समस्त ब्रजभर में भ्रमण कर श्री ललित माधुरी जी अपने बड़े भ्राता श्री ललित किशोरी जी के संग लखनऊ लौट गये।

पितामह, पिता एवं माता का स्वर्ग सिधारना :
वृन्दावन से लौटने के कुछ दिन बाद ही श्री ललित माधुरी जी के पितामह, पिता एवं माता स्वर्ग सिधार गए। बड़े भ्राता शाह कुन्दनलाल (श्री ललित किशोरी जी) को श्री राधारमण जी का स्वप्न में वृन्दावन आने का आदेश हुआ। इसके बाद दोनों भ्राताओं ने परिवार में संपत्ति का बंटवारा किया और सब बंधनो से मुक्त हुए।

वृन्दावन आगमन :
श्री राधारमणजी के आदेशानुसार एक विशाल मन्दिरके निर्माण के लिए पर्याप्त धन लेकर वृन्दावन जाना था। इसलिये 1856 वैशाख शुक्ला 13 को दोनों भाई रक्षाके लिए 4000 शस्त्रधारी सिपाहियोंकी सेना साथ लेकर वृन्दावनको चल पड़े। इन्होंने श्री राधारमण जी के मंदिर के समीप पटनीमल वाली कुंज में निवास करना प्रारंभ किया। इनके साथ के सेवक कुछ इनके पास रहे बाकी सब सेवकों के लिये यमुना किनारे बड़े-बड़े तम्बुओं में रहने का प्रबंध कर दिया गया।

अपने सेव्य श्री राधारमण जी के लिए निधिवन के समीप एक भव्य मंदिर का निर्माण करना :
वृन्दावन में कुछ दिन रहने के उपरांत श्री ललित किशोरी जी एवं श्री ललित माधुरी जी ने निधिवन के समीप में ही अपने सेव्य ठाकुर श्री राधारमण जी के लिए एक भाव मंदिर का निर्माण कराया। 1860 में माघ शुक्ल 5 को मंदिर का निर्माण कार्य आरम्भ हुआ। मंदिर में संगमरमर का पत्थर उपयोग किया गया एवं यह भव्य मंदिर 8 वर्षों में बनकर तयार हुआ। श्री ललित किशोरी जी ने इस मंदिर का नाम "श्री ललित निकुंज" रखा लेकिन वर्त्तमान में यह 'शाहजी का मंदिर' या 'टेड़े खंबे वाला मंदिर' के नाम से ही जाना जाता है। 1868 माघ शु० 5 को अत्यन्त सामारोह के साथ श्री ललित किशोरी जी एवं श्री ललित माधुरी जी ने अपने सेव्य श्री राधारमणजी [छोटे आकार के कारण इन्हें 'छोटे राधारमण' कहा जाता है] का श्रीविग्रह इस नूतनभवन में ले आये और यही उनकी स्थापना की। दोनों भाइयों का शेष जीवन इसी मंदिर में बड़ी शांति और आनंद से व्यतीत हुआ। मंदिर प्रांगण के पूर्व छोर पर, एक बड़ा हॉल है जिसे बसंती कमरा (दरबार हॉल) कहा जाता है जो बेल्जियम देश से मंगवाए गए कांच के झूमर और अति सुंदर चित्रों से सुशोभित है जो भगवान राधा-कृष्ण के प्रेमपूर्ण लीलाओं को दर्शाता है। यह कमरा बसंत पंचमी के अवसर पर वर्ष में केवल दो बार खोला जाता है और इसके मध्य भाग में फव्वारे भी हैं। ललित किशोरी और ललित माधुरी के ठाकुर जी के सेवक यहां रहते हैं।

रासलीला स्वरूपों की रक्षा करना :
जब श्री ललित माधुरी जी वृन्दावन में थे तब इनके यहां रासलीला बड़ी मर्यादा और बड़े व्यय से होती थी। इनके बड़े भ्राता लीलाओं की रचना करते थे। श्री ललित माधुरी जी उनका प्रबन्ध करते थे। एक दिन इनके यहां से यमुनाजी के घाटों पर जल केलि के लिये रासलीला रवाना हुई। आगे आगे श्री राधाकृष्ण नृत्य करते जाते थे, पीछे समाज था, उनके पीछे दर्शकों की भीड़ थी। श्री राधारमणजी के मन्दिर के सामने तिराहे पर जब पहुंचे तो भोंरा घाट की गली से दो सांड़ लड़ते लड़ते स्वरूपों पर झपटे, पीछे के दर्शक सब हाय हाय करने लगे। श्री राधाकृष्ण नृत्य में ऐसे लीन थे कि उनको इस बात का पता भी न था। यह देखकर श्री ललितमाधुरी जी झट आगे दौड़ आये और दोनों सांड़ों के माथे पर हाथ फेर कर पुचकारने लगे और दोनों के सींग पकड़ कर दूसरी ओर ले गये। आपका यह कार्य देखकर सभी चकित हो गये। इनके गुणों का कहाँ तक वर्णन करना संभव है।

बड़े भ्राता श्री ललित किशोरी जी की सेवा :
श्री ललित माधुरी जी का संपूर्ण जीवन श्री बड़े शाहजी साहब की सेवा ही में व्यतीत हुआ। इनमें बड़े शाहजी साहब के सब गुण विद्यमान थे। रहन, सहन, स्वभाव, चरित्र सब उनके जैसा ही था। ये बड़ी सुन्दर कविता की रचना करते थे। इनका उपनाम "ललितमाधुरी" था। 1873 से 1885 तक इन 12 वर्षों में इन्होंने श्री ललित किशोरी जी के पद और लीलाये संग्रह की। उनमें से कुछ पुस्तके इन्होंने छपाई भी थीं।

रचना :
श्री ललित माधुरी जी ने अनेक पदों की रचना की है जो 'अभिलाष माधुरी' ग्रन्थ में उनके भ्राता श्री ललित किशोरीजी की रचनाओं के संग ही संकलित है।

लीला संवरण :
1885 जेष्ठ शु० 5 को प्रातःकाल श्री ललित माधुरी जी ने अकस्मात रज का चबूतरा तयार करने की आज्ञा दी। ये पूर्णतया नीरोग थे अतः इस आज्ञा से इनके अनुचरों को बड़ा आश्चर्य हुआ तथापि चबूतरा श्रीयमुनाजी की रज का तयार कराकर इनसे प्रार्थना की। श्री ललित माधुरी जी ने कहा कि ले चेला (आपको कई वर्ष से पक्षाघात था अतः स्वयं नहीं चल सकते थे) इनकी कुर्सी चबूतरा के समीप ले जाई गई। ये उसपर बैठकर कीर्तन करने लगे। इनके पुत्र शाह माधुरी शरणजी दिल्ली गये थे उनको तार देकर बुलवाया गया। उनके आने पर उनसे कुछ आवश्यकीय निर्देश कर श्री ललित माधुरी जी संकीर्तन करते करते नित्य सेवा में प्रविष्ट हो गए।
इनकी समाधी भी इनके बड़े भ्राता श्री ललित किशोरी जी के संग ही 'शाहजी का मंदिर' में ही चांदपोल नामक द्वार पर बनाई गयी (जो निधिवन के द्वार के साथ है)।