यह रस ब्रह्मलोक पाताल अवनी हूँ - श्री वृंदावन दास चाचा जी,  युगल स्नेह पत्रिका (55)

यह रस ब्रह्मलोक पाताल अवनी हूँ - श्री वृंदावन दास चाचा जी, युगल स्नेह पत्रिका (55)

यह रस ब्रह्मलोक पाताल अवनी हूँ दरसत नाहैं ।
या रसकौं कमलापुर हूँ के तरसत हैं मन माहैं ।। [1]
यह रस रासेश्वरी कृपातैं प्रेमी जन अवगाहैं ।
वृंदावन हित रूप जुगल रहैं या रस भरे उमगहैं ।। [2]
- चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (55) 

यह ऐसा अद्बुत रस है जो ब्रह्म लोक एवं पाताल लोक में नहीं देखने को मिलता, इस वृंदावन रस के लिए वैकुंठ के जन भी तरसते हैं । [1]

यही वृंदावन रस श्री रासेश्वरी राधा रानी की कृपा से ही प्रेमी [रसिक] जनों को सुलभ होता है । श्री हित वृंदावन चाचा जी कहते हैं, "रसिक संत दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण के रूप में ही डूबे रहते हैं, और इस रस का पान कर नित्य ही उमंग में भरे रहते हैं "। [2]