भींजी नवेली चँवेली फुलेल सौं - श्री ध्रुवदास - बयालीस लीला, श्रृंगार शत (1.48)

भींजी नवेली चँवेली फुलेल सौं - श्री ध्रुवदास - बयालीस लीला, श्रृंगार शत (1.48)

भींजी नवेली चँवेली फुलेल सौं,
फुलनि के पट भूषन सोहैं । [1]
लोइन बंक बिसाल सचिवकन,
अंजन की छबि प्राननि मोहैं ।। [2]
रूप तरंगनि पानिप अंगनि,
प्यारी सखी ललितादिक जोहैं । [3]
भूलि रही 'ध्रुव' तौ छबि श्री अरु,
मोहनी मैंन की नारि धौं को है ।। [4]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत, प्रथम श्रृंखला (48)

आज नवोढ़ा प्रिया मल्लिका-पुष्पों के सौरभसार से भींगी हुई, पुष्पों के ही वस्त्रालंकारों से अलंकृत हो रही है । [1]

उनके बाँके विशाल रसीले लोचनों में सजी हुई अंजन की रेखा प्राणों का मोहन करती है ।[2]

उनके रूप की तरंग-छटा, श्री अंगो का लावण्य एवं श्री मुख-छवि को ललितादिक प्रिय सखियाँ आश्चर्य चकित भाव से जोह रही है । [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि प्रिया की इस छबि को देखकर जब साक्षात् श्री एवं मोहिनी भी अपना रूप-गौरव विस्मृत कर बैठती है, तब वहाँ मदन-प्रिया रति  की तो गणना ही क्या है । [4]