श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की जीवनी

श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की जीवनी

परिचय :
श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी महाराज अखिल भारतीय जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठ (सलेमाबाद, किशनगढ़) के एक सुप्रतिष्ठित आचार्य थे। इनकी विद्वत्ता और भक्ति भावना इनकी वाणी के अनुशीलन से स्पष्ट हो सकती है।
इनके बाल्य काल का जीवन-वृत्त, जन्मस्थान, माता पिता आदि का परिचय मिलना कठिन है। वास्तव में आचार्य हो या महन्त अथवा सामान्य विरक्त, सभी सन्तों का आरम्भिक जीवन-वृत्त प्रायः अज्ञात ही रहता है। कारण स्वयं वे अपना परिचय नहीं देते। उनके लिये ऐसा विधान भी है :
"नाम गोत्रञ्च चरणं वेशं वासं, श्रुतं कुलम्।
वयो विद्याञ्च वृत्तिञ्च ख्यापयेन्नव सद्यतिः”॥
सन्तों को अपना नाम, गोत्र, जाति, देश, आवासस्थान, अध्ययन, कुल, अवस्था, विद्या, वृत्ति (जीवन) आदि किसी को नहीं बतलाना चाहिये।
 
इसी कारण उनके आरम्भिक जीवन का पता नहीं चलता। हां ! इतना सुनिश्चित है कि इनके परमगुरु श्रीवृन्दावनदेवाचार्य जी और शिष्य श्रीसर्वेश्वरशरणदेवाचार्य जी तथा उनके प्रशिष्य श्रीब्रजराजशरणदेवाचार्य जी जयपुर मंण्डलान्तर्गत सराय शूरपुरा नामक ग्राम के रहने वाले, गौड़द्विज श्रीभवानीरामजी के कुल में प्रकट हुये थे। श्रीगोपोश्वरशरणदेवाचार्य जी एवं श्रीघनश्यामशरणदेवाचार्यजी का जन्म स्थान हस्तेड़ा ग्राम है। सम्प्रदाय का एक बड़ा और छोटा दो मन्दिर भी हैं, जो सुप्रतिष्ठित माने जाते हैं। उन में बड़ा मन्दिर किशनगढ़ रैनवाले के श्रीमहन्त जी के आधीन है, और छोटे मन्दिर के महन्त श्रीबद्रीदास जी हस्तेड़ा के ही हैं।
श्रीनारायणदेवाचार्य जी श्रीवृन्दावनदेवाचार्य जी के मन्त्रोपदेशक गुरु थे। श्री गोविन्द देवाचार्य जी और श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी ने गौड द्विज कुल को अलंकृत किया। 
 
आध्यात्मिक जीवन :
श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी ने श्रीगोविन्द देवाचार्य जी से मन्त्र दीक्षा ग्रहण की थी। 1757 में कार्तिक कृष्णपक्ष के आरम्भ में ही आचार्य श्रीगोविन्ददेवाचार्य जी परमधाम पधार गये। तब श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी सिंहासनासीन हुए। ये बड़े प्रतिभावान, त्यागी और विद्वान् कवि थे। इनके दर्शन करके ही दर्शकजन विमुग्ध हो जाते थे। बड़े-बड़े राजा, महाराजा और रानियों को इनके दर्शनों की लालसा लगी रहती थी। उनके द्वारा भेजे हुए पत्रों से यह पता लगता है।
 
श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी में समस्त राज परिवार की श्रद्धा :
1758 के आषाढ में जोधपुर नरेश महाराजा सिंहजी की रानी कछबाइजी रूपनगर होती हुई श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी के दर्शनार्थ रथयात्रा के अवसर पर आचार्यपीठ (सलेमाबाद) पहुँचीं। दर्शन करके बड़ी प्रसन्न हुई। इसी प्रकार अन्याऽन्य नरेशों की इनमें हार्दिक श्रद्धा थी। यही कारण है कि इनके आचार्यकाल में आचार्य पीठ की विशेष उन्नति हुई। चिट्ठी पत्रियों से ज्ञात होता है की गुरुदेव की विद्यमानता में ही इन्होंने पीठ का समस्त प्रबन्धभार अपने कंधों पर उठा लिया था, अतएव राजा और प्रजा सभी इनको श्रीजी महाराज के नाम से सम्बोधित करने लग गये थे। 
 
श्रीजयदेव कवि के सेव्य ठाकुर श्रीमाधवजी का राधा कुण्ड से आचार्य पीठ पधारना :
1766 में श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी से सम्बंधित एक विशेष उल्लेखनीय घटना घटी थी। श्रीजयदेव कवि के सेव्य ठाकुर श्रीमाधवजी राधा कुण्ड पर विराजते थे। यद्यपि वह स्थान (श्रीनिवासाचार्यजी की भजनस्थली) आचार्य पीठ का ही था तथापि राधाकुण्ड के पुरोहितों का श्रीमाधव जी में विशेष ममत्व होना स्वाभाविक था, कारण दर्शनार्थ यात्री वहां पहुँचते तो तीर्थ परोहितों को विशेष लाभ होता था। किन्तु श्रीमाधवजी की लीला समझ में नहीं आ सकती, उन्होंने श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी को स्वप्न में आदेश दिया, अब हमें आप आचार्य पीठ सलेमावाद ले चलिये, तब उन्होंने प्रार्थना की -प्रभो ! वह मरुस्थल है, वहां कँटीले वृक्ष हैं, बाजरा मोठ जौ चने का खान है। "भगवान् ने आज्ञा दी वही हमे स्वीकृत है।" आचार्य श्री ने फिर पूछा- आप कैसे पधारेंगे तब श्रीमाधवजी ने कहा तुम्हारे रथ में बिठाकर हमें ले चलो।
इस प्रकार भगवान् की आज्ञा प्राप्त करके जब श्रीमाधव जी को अपने रथ में विराजमान करके प्रस्थान किया तो, राधाकुण्ड के निवासियों ने आन्दोलन मचाया, रोका और पीछा किया, किन्तु श्रीमाधव भगवान् का रथ भरतपुर जा पहुँचा। वहां सेवा हुई, भरतपुर नरेश ने समग्र परिस्थिति का अध्ययन करके यह घोषित किया “श्रीमाधवजी अपनी इच्छा से ही ब्रज में पधारे थे, अपनी इच्छानुसार ही श्रीराधाकुण्ड पर विराजकर भक्तों के मनोरथ पूर्ण किये, अब राजस्थान के भक्तों को कृतार्थ करने की इच्छा है, यदि विश्वास न हो तो सभी आन्दोलनकर्त्ता रथ को खैच कर वापिस लौटा ले जायें।"
इस निर्णय को सुनते ही सभी व्रजवासी प्रसन्न होकर रथ में लग गये, जितना बल था, सभी ने लगा लिया, किन्तु रथ एक तिल भी अपने स्थान से नहीं हटा तब श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी ने प्रभु से प्रार्थना करके रथ को खैंचा तो वह चल पड़ा, दर्शक चकित हो गये, जय ध्वनि और पुष्पों की वर्षा होने लगी। वह रथ, समारोह पूर्वक सानन्द आचार्य पीठ सलेमाबाद पहुँचा और ज्येष्ठ शु० 10 को बड़े उत्साह के साथ श्रीमाधवजी की सलेमाबाद में प्रतिष्ठा हुई। दूसरे दिन रूपनगर से महाराजा सरदार सिंहजी दर्शनों के लिये पहुँचे। श्रीमाधवजी की ललित त्रिभंगी के दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए। 224 बीघा जमीन भोग राग के लिये दी, तदनन्तर आचार्य श्री के 4 मुहरें, दुशाला और नगद रुपये आदि भेंट प्रदान किये। आचार्य श्री ने प्रसाद, प्रसादी वस्त्र (कीनखाप ) फैंटा आदि दिये।
 
राजकुल की समस्याओं का समाधान :
प्रसंग 1 :
किशनगढ़ के राजकुल में जब कोई जटिल समस्या उपस्थित होती, तो उसे सुलझाने एवं शान्त करने में आचार्य पीठ सलेमाबाद का विशेष योगदान रहता था, 1774 में भी ऐसी घटनायें घटीं थी - महाराजा बहादुर सिंहजी के छोटे भ्राता श्रीवीरसिंह जी (व्रजकुमारीजी से उत्पन्न) के अमर सिंहजी और सूरतसिंहजी दो पुत्र थे। बड़े भ्राता को करकेड़ी और छोटे को रलावता जागीर में दिया हुआ था, किसी कारण वश महाराज कुमर विरद सिंहजी से उनकी कुछ अनबन हो गई थी। 1774 की वैशाखी पूर्णिमा को ये सभी आचार्य पीठ सलेमाबाद पहुँचे, (यह किशनगढ़ के निकटवर्ती एक विशिष्ट तीर्थ माना जाता है) श्रीसर्वेश्वर कुण्ड में स्नान, श्रीराधामाधवजी और आचार्य श्री के दर्शन किये। सभी ने पंगत में बैठकर श्रीसर्वेश्वर प्रभु का प्रसाद लिया। तत्पश्चात् आचार्य श्री के समक्ष बैठक हुई। श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी ने सब को समझा बुझाकर सुलझन करा के परस्पर प्रेमभाव करा दिया।
 
प्रसंग 2 :
महाराजा कुमार विरद सिंहजी की राजकुमारी अखैकुमारी का 1771 ज्येष्ठ शुक्ला 10 को जयपुर नरेश पृथ्वी सिंहजी से पाणिग्रहण सम्बन्ध हुआ, 1778 में जब पृथ्वी सिंहजी का देहावसान हुआ, तब अखैकुमारी 6-7 मास की गर्भवती थीं। अतः छोटे भ्राता प्रताप सिंहजी जयपुर राज्य की राजगद्दी पर बिठाये गये । 3-4 मास के बाद जब अखैकुमारी की कोख से राजकुमार का जन्म हुआ तो उनका नाम मानसिंह रक्खा गया। अढाई तीन वर्ष की अवस्था हुई तब वह राजकुमार कृष्णगढ़ में ही था। 1781 आश्विन शुक्ला 4 को आचार्य श्री गोविन्दशरण देवाचार्यजी महाराज किशनगढ़ में ही विराज रहे थे। इनसे ही मान सिंहजी को वैष्णवी दीक्षा दिलाई गई। इसी वर्ष श्रीगोविन्दशरण देवाचार्य जी महाराज वृन्दावन पधारे। कृष्णगढ़ के महाराज कुमार विरद सिंहजी साथ में थे। गंगा और कमोदराय ने विहारघाट पर एक दालान महारा का निर्माण करवाकर उसी अवसर पर आचार्य श्री को भेंट किया।
 
राजकुल में आचार्य पीठ का आदर :
1780 फाल्गुन शुक्ला 3 को किशनगढ़ नरेश बहादुर सिंहजी का देहावसान होने पर उनके सुपुत्र विरद सिंहजी राज्यासन पर आरूढ हुए, तब एक सौ सात रियासती ठिकानों का दस्तूर (दुशाला पाग आदि सत्कार) हुआ था, उनमें 18 धर्म स्थानों का सत्कार था। उन सब में सर्वप्रथम सत्कार आचार्य पीठ सलेमाबाद की ओर से हुआ था। तत्पश्चात् काचरिया महन्तजी आदि के दुपट्टे आदि उढ़ाये गये थे। इससे प्रमाणित होता है कि–किशनगढ़ राज्य में आचार्यपीठ सलेमाबाद का सर्वोच्च समादर रहा है।
महाराजा विरद सिंहजी की रानी रतनकुमारी जी श्रीगोविन्दशरण देवाचार्यजी की ही शिष्या थीं, वे प्रायः पुष्कर रहा करती थीं। उनकी ओर से आचार्य श्री की आज्ञानुसार श्रीपरशुराम द्वारा में सदाबर्त लगता था। 1782 कार्तिक कृष्ण 10 को रानीजी का वहां ही परमधाम वास हुआ था। जब ये किशनगढ़ किले में रहती थीं, तब ठाकुर श्रीराधामोहन जी की आराधना में संलग्न रहती थीं।
 
श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी को 'श्रीजी' उपाधि का प्रसंग :
श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी वास्तव में एक महान् प्रतापी आचार्य थे। उन्होंने सनातन धर्म की उल्लेखनीय सेवा की है। वे धर्मप्रचारार्थ भारत के सभी प्रान्तों में भ्रमण किया करते थे। सलेमाबाद के आचार्यों का "श्रीजी" उपाधि का विशेष प्रचार-प्रसार भी इनके समय से ही हुआ है। इनके पूर्ववर्ती आचार्यों के नाम जो राजाओं द्वारा भेजे हुए पत्र एवं पट्टे आदि मिलते हैं, उनमें श्रीस्वामीजी, श्रीमहाप्रभुजी आदि विशेषण ही मिलते हैं, इस सम्बन्ध की परम्परागत एक विशिष्ट जनश्रुति भी प्रचलित है -
"जब महारानियां श्रीसर्वेश्वर प्रभु के दर्शनार्थ आती थीं, तब एक अर्चक पुजारी के अतिरिक्त दूसरा कोई भी पुरुष वहां नहीं रहता था। इसी प्रकार आचार्य श्री के दर्शन करने आतीं तब भी वहां केवल आचार्य श्री ही विराजे रहते थे। जब कभी आचार्य श्री रनवासों में पधारते थे, तब भी ऐसी ही प्रथा थी। परिचारकगण ड्योढ़ी (रणवास के द्वार) पर बाहर ही रह जाते थे। रानियां और उनकी परिचारिकायें आचार्य श्री का अर्चन करती थीं, आचार्य श्री उनको दीक्षा, मन्त्रोपदेश देते थे। उसमें समय भी लगता था। एक बार जब श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्य जी महाराज जयपुर नरेश के महलों में विराजकर रानियों को उपदेश दे रहे थे, तब किसी विद्वेषी ने जयपुर नरेश को बहकाया, तब परीक्षा लेने के लिये जयपुर नरेश अचानक बिना ही सूचना किये अंतः पुर में जा पहुँचे, वहां सिंहासन पर विराजमान आचार्य श्री का दर्शन किया। साक्षात् वृषभानु नन्दिनी श्रीराधाजी का भाव हुआ। राजा चरणों में पड़ गये, क्षमा याचना की, तब से "श्रीजी" पद का सर्वव्यापी प्रचार-प्रसार हुआ। यद्यपि श्रीनिम्बार्क भगवान् और उनके पूर्व से भी सम्प्रदायाचार्यों को श्रीप्रियाजी की अन्तरंगा सखियों का रूप माना है, महावाणी आदि में इस सम्बन्ध का स्पष्ट उल्लेख है ही, तथापि उसका प्रत्यक्ष श्रीगोविन्द शरणदेवाचार्य जी ने करवाया, यह इनकी एक विशिष्टता थी। आचार्यों के प्रकट नामों में जो शरणान्त पद जुड़ा है, वह भी आपके समय से ही प्रचलित हुआ है। उस से पूर्व देव शब्द ही प्रयुक्त होता था।
 
भवन को गिरने से बचाना और संतों की रक्षा करना :
एक समय किसी भावुक भक्त ने भगवान् श्रीसर्वेश्वर प्रभु के विशिष्ट भोग समर्पण कराया, भगवान् की राजभोग आरती के अनन्तर जब सन्तों और भक्तों की विशाल पंगत बैठी और सभी भगवत् प्रसाद लेने लगे तो रसोई के भवन की छत टूटने की एक विचित्र आवाज आई और सबके देखते-देखते भवन की छत की कई पट्टियाँ भी टूटने लगी। पंगत में बैठे सभी सन्त और भक्तजन व्याकुल हो उठे। उस समय श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी ने सांत्वना देते हुए कहा कि डरो मत इसका अभी प्रबन्ध हो जाएगा। आचार्यश्री ने उसी समय भगवान श्रीसर्वेश्वर प्रभु का स्मरण करते हुए अपने हाथ की छड़ी को छत से स्पर्श करा कर सबसे कहा आप लोग शांतिपूर्वक भगवान का प्रसाद पा लो। आप सबके प्रसाद पा लेने पर ही भवन गिरेगा। हुआ भी वैसा ही, पंगत के उठने पर आचार्यश्री अपनी छड़ी को हटाकर वहाँ से बाहर आये कि उसी समय वह विशाल भवन पूरा का पूरा धराशाही हो गया। आचार्यचरणों द्वारा इतने बड़े विशाल भवन को गिरने से रोके जाने का चमत्कारपूर्ण दृश्य देखकर समस्त सन्त भावुक भक्तजनों को अत्यंत विस्मय हुआ और आपके अद्भुत प्रभाव से चकित हो उठे। सन्तों ने आचार्यश्री से भवन के अकस्मात् गिरने का कारण जानना चाहा। आचार्यश्री ने सभी का समाधान करते हुए बताया कि देखो, आज जिस भक्त द्वारा भोग समर्पित हुआ है वह अन्न पूर्ण पवित्र न होने के कारण ही यह आकस्मि घटना घटी।
 
शिष्य प्रशिष्य :
श्रीगोविन्दशरण देवाचार्य जी के शिष्य वैसे तो असंख्य थे, विरक्त शिष्यों में प्रमुख श्रीसर्वेश्वरशरणदेवाचार्य जी थे, उनके अतिरिक्त और भी बहुत से थे। प्रतापी और साहित्यिक कवियों में श्रीकिशोरीदासजी भी थे। 1742 के पद संग्रह में उनका निम्नांकित-पद-उल्लिखित है -
 
नमो नमो जै श्री निम्बादित।
श्रीरंगदेवीरूप सहचरी लागि रही चरननि राधा नित॥
यह कलिकाल महा अति दुस्तर, प्रगट भये प्रभु भक्त जनन हित।
किशोरीदास पर करुणा करि कैं, श्रीगोविन्दशरण दये मन वंछित॥
 
श्रीगोविन्दशरण देवाचार्य जी के एक कवि शिष्य चरन दासजी थे, उन्होंने 1763 के माघ मास में गुरु पद्धति की रचना की थी। उसमें श्रीगोविन्दशरण देवाचार्य पर्यन्त आचार्य परम्परा देकर अन्त में यह छप्पय लिखा है :
 
तिहिं गादी हरि व्यास देव सुख राशि विराजैं,
परशुराम हरिबंस तहां आनन्दित राजैं।
श्रीनारायणदेव विराजत गादी शोभा,
श्रीवृन्दावन देव तहां भ्राजैं गुन ग्रामां। 
श्रीगोविन्द बसैं तहां स्तुति कौन पै जाय रट,
गोविन्दशरण करुणा उदधि तिहिं गादी राजैं प्रकट।
 
अपर शिष्य श्रीराधिकादास जी थे, जो संस्कृत और हिन्दी के अच्छे लेखक विद्वान थे। उन्होंने स्तव-स्मरणी आदि संस्कृत के कितने ही ग्रन्थों की प्रतिलिपि 1798 में की थी, उससे पूर्व लीलाविंशति आदि हिन्दी के कई ग्रन्थों की प्रतिलिपि कर चुके थे। उसमें श्रीगोविन्दशरण देवाचार्य जी की रचना भी उपलब्ध होती है। 
श्रीगोविन्दशरण देवाचार्य जी के एक शिष्य बाबा अलखराम थे, जिहोंने शैव गुसाईयों को पराजित करने में वैष्णवों को महान् सहयोग दिया था। उनका अखाड़ा हरिद्वार में विष्णु तीर्थ पर आज भी विद्यमान है। 
 
रचना :
श्रीगोविन्द शरणदेवाचार्य जी का वृहद् वाणी ग्रन्थ भी है, जो "श्रीगोविन्दशरणदेवाचार्यजी की वाणी" के नाम से प्रकाशित भी हो चुका हैं। इस ग्रन्थ की ललित पदावली का मनोरम शब्द गुम्फन बड़ा ही आकर्षण और अलंकार पूर्ण है, युगलकिशोर श्री श्यामाश्याम की रसमयी लीलाओं का चित्रण बड़ा ही भावयुक्त और परम् सरस है, जिसके अवलोकन मात्र से ही हृदय प्रफुल्लित हो उठता है। इनकी प्रखर विद्वत्ता और सिद्धि सम्पनता सर्व विदित है। 
 
लीला संवरण :
इस प्रकार 27 वर्ष पीठासीन रहकर 1784 के चैत्रमास में श्रीगोविन्द शरणदेवाचार्य जी ने नित्य निकुंज लीला में प्रवेश किया। इनके उत्तराधिकारी श्रीसर्वेश्वरशरण देवाचार्यजी ने आचार्य पद को अलंकृत किया। इनका विशेष महोत्सव 8  वर्ष पश्चात् 1792 ज्येष्ठ मास में हुआ था, उस अवसर पर जयपुर से गलता और बालानन्दजी के महन्त तथा रेवासा के महन्त वेणीदासजी आदि महान्त महानुभाव और किशनगढ़ नृप महाराजा प्रताप सिंहजी आदि नरेश सम्मिलित हुए थे।