कबहुं न जा पथ भ्रम-तिमिर, रहै सदा सुखचंद ।
दिन दिन हीं बाढत रहै, होत कबहुं नहि मंद॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (8)
सच्चे प्रेम के मार्ग में भ्रम या संदेह का अंधकार नहीं रहता। प्रेमी सदैव आनंद से भरा रहता है और उसका प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है; उसमें कभी कमी नहीं आती।
दिन दिन हीं बाढत रहै, होत कबहुं नहि मंद॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (8)
सच्चे प्रेम के मार्ग में भ्रम या संदेह का अंधकार नहीं रहता। प्रेमी सदैव आनंद से भरा रहता है और उसका प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है; उसमें कभी कमी नहीं आती।

