परिचय :
महत सभा आभरन अनंत संग रहैं लहारैं।
अति कमनीय किशोर चरित नित रच विस्तारैं॥
जेते भूप हरि भक्ति रहे आज्ञा अनुसारी।
श्री बालकृष्ण प्रसाद भजन प्रभुता भई भारी॥
श्री हरिवंश प्रशंसचित बालकृष्ण की छाप ते।
चन्द्रसखी जगमगे श्री राधा इष्ट प्रताप ते॥
श्री चन्द्रसखी जी महात्माओं के सभा के आभूषण थे। ये सदैव श्री युगल किशोर की लीलाओं की पद रचना करते थे और समस्त हरि भक्तों को गुरु रूप से देखते थे। श्री चन्द्रसखी ने गोस्वामी बालकृष्ण जी से दीक्षा ग्रहण कर भजन किया जिससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गयी। ये अपने पद में अपने गुरु 'बालकृष्ण' की छाप देते थे। श्री चन्द्रसखी भक्त सभा में अपने इष्ट श्री राधा के प्रताप से जगमगा रहे हैं।
जन्म एवं बाल्यकाल :
श्री चन्द्रसखी का निवास स्थान ओड़छा था, इनका जन्म सोहलवीं शताब्दी में माना गया । इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनका पूर्व नाम एवं जन्म तिथि अज्ञात है। बाल्यावस्था से ही चन्द्रसखी श्री राधा कृष्ण के विरह में व्याकुल रहा करते थे।
आध्यात्मिक जीवन :
गुसाईं हितहरिवंश द्वारा स्थापित राधावल्लभी सम्प्रदाय के अनुयायी गोस्वामी बालकृष्ण जी श्री हितधर्म के प्रचार में बहुत संलग्न रहे। नागाओं की जमात लेकर गोस्वामी जी बहुत देशाटन करते रहे। भ्रमण करते ओड़छा पहुँचे; वहाँ पर इन्होंने एक सनाढ्य ब्राह्मण को शिष्य बनाया। कुछ का कथन है कि यह दीक्षा वृन्दावन अखाड़ा रासमंडल ( हितमंडल ) में हुई थी। यही ओड़छावासी, आगे जाकर चन्द्रसखी के नाम से प्रसिद्ध हुए। गोस्वामी बालकृष्ण की आज्ञानुसार चन्द्रसखी ने प्रचार के लिए बहुत देशाटन किया।
गुरु में इनकी अगाध भक्ति थी और यही कारण है कि इन्होंने अपनी छाप में 'भज बालकृष्ण छवि' सदा जोड़ा रखा। "भज बालकृष्ण" से बाल रूप कृष्ण की आराधना का अर्थ निकालना उचित नहीं, क्योंकि हित धर्म में तो राधा उपास्य हैं, न कि वल्लभ कुल के बालकृष्ण। कवि की यह छाप सदा एक सी ही रही होगी, पर कुछ साधारण हेर फेर के रूप भी मिलते हैं; जैसे - "भज बालकृष्ण छबि”, भज बालकृष्ण प्रभु”, “हित बालकृष्ण प्रभु", "हित बालकृष्ण छबि” आदि। देश भेद से भी इस छाप में "छबि" शब्द के कई पाठांतर, 'छब", "छिब” आदि मिलते हैं।
शिष्य :
श्री जी चन्द्रसखी के अनेक शिष्य हुए जैसे श्री रसिक सखी, श्री गोपालदास जी, आदि।
रचना :
चन्द्रसखी के पद काव्य की अपूर्व निधि न होकर, संगीत का भंडार है। पदों की भाषा का सरल प्रवाह और तुक धारी होने के कारण उन में एक सौष्ठव का आभास होता है। पदों में विशेषता लय की है। भाव, भाषा और विषय का प्रतिपादन साधारण ही है। पदों में कृष्ण लीला का गान है। उनके काव्य ब्रज, राजस्थान एवं अन्य प्रदेशों में बहुत प्रसिद्ध हैं। विनय, चितवन, मान, दान, बाँसुरी, विरह, भ्रमर गीत आदि सभी विषयों पर पद है। चन्द्रसखी के पद कृष्ण चरित और विनय संबंधी ही अभी तक पाए गए हैं, पर राम संबंधी एक अप्रकाशित पद भी मिला है, जिससे इनकी उदारता प्रकट होती है -
"रही रे कँवारी धनुष नहीं टूटे रे।
पिता प्रण लीयो धनुष तोड़ण को।
देस देस का भूप बुलाया, कठिण नहीं उठे रे।
चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण छबि, या तो प्रण नहीं छुटे रे।"
चन्द्रसखी के पदों का आदर भक्त मण्डली को छोड़कर संगीतकारों में भी अधिक है। शायद ही कोई गुणीजन हो जो इनका रचा पद नहीं जानता हो। वास्तव में इनके पदों की रक्षा का श्रेय संगीत के कलाविदों को ही है।
लीला संवरण :
चन्द्रसखी निकुंज लीला में कब पधारे, यह कहा नहीं जा सकता। चन्द्रसखी ने अपनी वृद्धावस्था व्रज में ही बिताई होगी। इनकी बैठक ओड़छा मड़ैया में है। इनके नाम की कुंज वृन्दावन में केशीघाट पर धीर समीर के क़रीब ही स्थित है। केशीघाट पर एक छोटा मन्दिर है। चारों ओर ग्वालों का निवास है। मन्दिर में कोई उल्लेखनीय सामग्री नहीं है।

