यत्प्रान्तदेश लवलेश विघूर्णितेन बद्धः क्षणाद्भवति कृष्णकरीन्द्र उच्चैः ।
तत्खञ्जरीटजयिनेत्रयुगं कदायं संपूजयिष्यति जनस्तव कज्जलेन?
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (42)
हे करुणामयि राधे! आप जब अपने नेत्रप्रान्त को लेश मात्र भी घुमाती हैं-(चञ्चल दृष्टि से इधर-उधर देखती हैं) तो कृष्ण-गजेन्द्र उसी क्षण दृढ़ बन्धन में आ जाता है। खञ्जन के नेत्रों को भी पराभूत करने वाले आपके इन नेत्रों की, मैं कभी आदर सहित काजल लगा कर पूजा कर सकूँगी?
तत्खञ्जरीटजयिनेत्रयुगं कदायं संपूजयिष्यति जनस्तव कज्जलेन?
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (42)
हे करुणामयि राधे! आप जब अपने नेत्रप्रान्त को लेश मात्र भी घुमाती हैं-(चञ्चल दृष्टि से इधर-उधर देखती हैं) तो कृष्ण-गजेन्द्र उसी क्षण दृढ़ बन्धन में आ जाता है। खञ्जन के नेत्रों को भी पराभूत करने वाले आपके इन नेत्रों की, मैं कभी आदर सहित काजल लगा कर पूजा कर सकूँगी?

