श्री प्यारी पद रेणु में, उमगत लोटत लाल ।
कोमल कर चुटकीनु लै, तिलक बनावत भाल ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.5)
श्री प्रियाजी के चरणों की पावन रज में लोटते हुए श्री लालजी अपार आनंद का अनुभव करते हैं और अपने हाथों से चुटकी भर रज लेकर उसे अपने मस्तक पर तिलक के रूप में धारण करते हैं।
कोमल कर चुटकीनु लै, तिलक बनावत भाल ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.5)
श्री प्रियाजी के चरणों की पावन रज में लोटते हुए श्री लालजी अपार आनंद का अनुभव करते हैं और अपने हाथों से चुटकी भर रज लेकर उसे अपने मस्तक पर तिलक के रूप में धारण करते हैं।

