यह छबि टरत न उर तें टारी ।
नवल कुंज में राजत पिय सँग श्री वृषभान कुमारी ।। [1]
मंडित बदन गुलाल लाल सों सुखमा बढ़ी अपारी ।
चरन टहल में राखौ स्वामिनि दासी मोहि बिचारी ।। [2]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वन विहार वर्णन (10)
यह छवि मेरे हृदय से नहीं निकल सकती, [जिस छवि में] वृषभानु कुंवरी श्री राधिका अपने प्रियतम श्री श्याम सुंदर संग वृंदावन के नवल कुंजों में विराज रहे हैं । [1]
उनके बदन पर लाल गुलाल लगा है जिसकी सुषमा अपार है । श्री लाल बलबीर कहते हैं कि हे स्वामिनी [राधे], मुझे अपने चरणों की टहल [सेवा] में ही नित्य रखो यह विचार कर की मैं आपकी ही दासी हूँ । [2]
नवल कुंज में राजत पिय सँग श्री वृषभान कुमारी ।। [1]
मंडित बदन गुलाल लाल सों सुखमा बढ़ी अपारी ।
चरन टहल में राखौ स्वामिनि दासी मोहि बिचारी ।। [2]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वन विहार वर्णन (10)
यह छवि मेरे हृदय से नहीं निकल सकती, [जिस छवि में] वृषभानु कुंवरी श्री राधिका अपने प्रियतम श्री श्याम सुंदर संग वृंदावन के नवल कुंजों में विराज रहे हैं । [1]
उनके बदन पर लाल गुलाल लगा है जिसकी सुषमा अपार है । श्री लाल बलबीर कहते हैं कि हे स्वामिनी [राधे], मुझे अपने चरणों की टहल [सेवा] में ही नित्य रखो यह विचार कर की मैं आपकी ही दासी हूँ । [2]

