श्री किशोरदास जी की जीवनी 

श्री किशोरदास जी की जीवनी 

जन्म :
मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया। श्री किशोरदास जी ने अपनी प्रसिद्ध रचना "निजमत सिद्धान्त" में अपना दीक्षाप्राप्ति काल अक्षय तृतीया, 1734 लिखा है। वे किशोरावस्था में ही दीक्षित हो गये थे। इससे उनका जन्म काल 1713 के लगभग अनुमानित किया गया है।
 
बाल्यकाल एवं दीक्षा :
श्री किशोरदास जी के माता-पिता की हरि-गुरु-सन्तों में अत्यन्त प्रीति थी और श्री गुरु - श्री स्वामी पीताम्बरदेव जी में दृढ़ निष्ठा। श्री गुरु ही दोनों के प्राण थे। बालक किशोरदास को बालवत् चंचलता करते देख माता मन ही मन गुरु-चरणों में उनका प्रेम होने का आशीर्वाद देती थी। प्रेम - विह्वलतापूर्वक मन में सोचती कि जब मैं श्री गुरु-चरणों को निहारती हूँ, तो तन, मन, प्राण न्यौछावर हो जाते हैं; किन्तु यह स्त्री शरीर हीन है, इससे श्री गुरु सेवा कैसे हो सकती है? यदि मेरा यह सुत वैरागी होकर श्री गुरुचरण कमलों में अनुराग करे और श्री स्वामी जी अपना जान इसे अपनावें, तो मेरा जन्म सफल हो जाय। उसी समय श्री पीताम्बर देव जी आमेर आये हुए थे। मैया ने अपने मनोभाव श्री गुरु के आगे प्रकट कर दिये। श्री गुरु ने रीझकर 1734 की अक्षय तृतीया को युगल-मंत्र की दीक्षा देकर इन्हें अपना लिया और कहा "यह बड़भागी है। तरुणास्वथा में वैरागी होगा।" यह सुन कर इनकी माता अत्यन्त प्रसन्न हुई।
माता दिन-दिन संसार की असारता दिखाते हुए इन्हें भगवत् तत्त्व का उपदेश करती रहती थी। वे कहती "पुत्र ! विष के समान माया को त्यागकर श्रीगुरु के वेष को धारण कर।"
 
प्रथम वृन्दावन आगमन एवं विरक्त दीक्षा  :
जब माँ ने शरीर त्याग दिया, तब श्री किशोरदास जी को संसार से उत्कट वैराग्य हो गया। इनके पिता भी इन्हें विवाह करने का आग्रह करने लगे, तब उसी क्षण इन्होंने प्रण ले लिया कि अब मैं वैरागी बन श्री वृन्दावन में विचरण करूंगा। यह विचार कर युक्तिपूर्वक ये घर से निकले और वृन्दावन आकर श्री गुरु-चरण कमलों में प्रणाम किया। श्री गुरु ने इन्हें हृदय से लगाया और सिरपर हाथ फिराते हुए पूछा "कैसे आया?"
इन्होंने सब बातें बताकर प्रार्थना की "प्रभु! मुझे अब अपनी शरण में रखिये। मैं सर्वस्व त्यागकर युगल चरणों की सेवा की कामना से आया हूँ। मेरे हृदय में अपने स्वरूप का प्रकाश कीजिये।" श्री गुरु ने शुभ संस्कार करके इन्हें अपना स्वरूप देकर वैरागी भेष प्रदान किया।
 
पिता का वृन्दावन आना एवं घर लौटने के लिए आग्रह करना एवं गुरु आज्ञा से घर लौटना :
कुछ दिन बाद श्री किशोरदास जी के पिता द्विज गणों को संग लेकर इन्हें लिवाने के लिए वृन्दावन आये। तब इन्होंने एक उपाय सोचा। कंधे पर गूदड़ी और हाथ में करुवा लेकर यमुना पुलिन चले गये। वहीं वास करते हुए ये व्रजवासियों से मधुकरी के टूक माँग लाते और उन पर यमुना जल छिड़कर पा लेते। इनके पिता वहीं चले आये और श्रुति-स्मृति वचनानुसार वर्णाश्रम की अधिकता दिखाते हुए गृहस्थ धर्म की बड़ाई करने लगे। वे प्रवृति धर्म की बड़ाई करते, ये निवृत्ति धर्म की। इस प्रकार पिता-पुत्र में बंध-मोक्ष पर अमित वाद-विवाद हुआ। अन्त में इनके पिता हारकर गुरु श्री स्वामी पीताम्बरदेव जी के पास आये और विनय सहित कहने लगे "किशोरदास को मेरे संग भेज दीजिये। मैं आपका बड़ा एहसान मानूँगा। यदि यह परिपक्व वैरागी होगा, तो इसकी आपके चरणों में दृढ़ता से लगन लगी रहेगी और वहाँ टिक न सकेगा। यदि कचाई होगी तो आपके पास भी कैसे टिकेगा? इससे एकबार इसे मेरे संग भेज दीजिए।"
घासीराम का तर्क सुन श्री स्वामी जी ने इन्हें पिता के संग घर भेज दिया। सब कुटुम्बियों ने जाति-वर्णाश्रम का उत्कर्ष बताते हुए इनको बहुत प्रकार से समझाया। जैसे नृप-पत्नी नीच के घर में कभी भी प्रवेश नहीं कर सकती, इसी तरह उनके कथन का इनके हृदय में लेशमात्र भी प्रवेश न हुआ। घासीराम इनको उत्तम तत्व ज्ञान युत दृढ़ जान कर हाथ जोड़े निकट आये और प्रणाम कर कहने लगे "अब तू भागवत बन गया।" अचानक ही श्री गुरु श्री वृंदावन से वहाँ आ गये। सभी सेवक दर्शन करने के लिए उमड़ पड़े। इनके पिता भी इन्हें संग लेकर चले और श्री गुरु को सौंप दिया। श्री स्वामी पीताम्बरदेव जी जयपुर से लोहागढ़ होते हुए पुष्कर में चतुर्मास विराजे। 
 
तीर्थ यात्रा एवं श्री हरि की कृपा :
श्री किशोरदास जी के मन में तीव्र वैराग्य छाया हुआ था। अब तीर्थ यात्रा करने की प्रबल इच्छा हुई। श्री गुरु की आज्ञा ले गले में गूदड़ी, हाथ में करुवा और दो कोपीन लेकर चल दिये। चतुर्भुज, युगलनाथ, एकलिंग, भड़ोंच, ब्रह्मकुण्ड आदि अनेक तीर्थों के दर्शन करते हुए तुलसी-श्याम के दर्शन कर इनका मन प्रसन्न हुआ। वहाँ से ये प्रभास क्षेत्र होते हुए गिरिनार पर चढ़े। वहाँ से पिंडारक तीर्थ का विचार किया। वहाँ इन्हें दो काबावासी मिले। उन्होंने इनकी श्री गुरु प्रदत्त माला छीन ली। तब ये बहुत दुःखी हुए और श्री हरि को प्रेम भरा उपालम्भ सुनाया।
ये आगे चले तो ढाई सौ सन्तों की जमात का संग मिला। नेह हुती चारण बस्ती में निवास किया। सवा सौ धुनियाँ जलने लगीं। उनका धुआँ नभ में छा गया और वैसी ही अँधियारी रात्रि थी। ये ओढ़कर सो गये। इनका मन श्री गुरु प्रदत्त माला में अटका हुआ था। इतने में ही नर का स्वरूप धरे श्री हरि आये और इनको माला देते हुए मृदु वाणी में बोले "जिसके लिए इतने कलप रहे हो, लो वही श्री गुरु-प्रदत्त माला हम तुम्हें देते हैं।"
इनके साथ एक निश्किंचन रामसनेही नाम के साधु थे। उनसे इन्होंने कहा कि "यह माला आ गई।" वे साधु माला देख अति प्रसन्न हुए और अचम्भे में बोले "अधिक धुआँ से भरी अँधेरी रात में, सैकड़ों साधुओं के समूह में तुम्हें पहचान कर यह माला कौन दे गया? निश्चय ही वे तो ठाकुर रणछोड़राय होंगे? वे किधर गये?"
तब इन्होंने कहा "इस गोशाला में प्रवेश किया है।"
यह सुन ये दोनों दौड़े और बहुत काल तक गोशाला में खोजते रहे, किन्तु वे नहीं मिले।
सबेरा होते ही सभी गोमती नदी में स्नान के लिये चल दिये। वहाँ से रामड़ौ ग्राम आये, जहाँ तप्त छाप लगती है। सभी संत तप्त छाप लेने लगे। किन्तु श्री किशोरदास जी मन में विचार करने लगे - रसिक-अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी महाराज का धर्म सबसे श्रेष्ठ है। श्री गुरु ने उनकी रसिक छाप भुजाओं पर दी है। उस पर और छाप कौन ले? ऐसा विचार कर तप्त मुद्रा नहीं ली। सब संत कहने लगे "तुमने छाप नहीं ली, तुम्हें द्वारकानाथ कैसे दर्शन देंगे?"
इन्होंने कहा "श्री हरि अन्तर्यामी हैं। यदि मेरे मन में अपने इष्ट श्री स्वामी के प्रति दृढ़ प्रेम है, तो श्री हरि अवश्य मिलेंगे।" खाड़ी को उतर कर बेंट (द्वारका) में सब आए। सबसे पहले इन्हीं को दर्शन मिले।
 
श्री हरि का म्लेक्षों से रक्षा करना :
वहाँ से श्री किशोरदास जी गोपीचन्दन, पिंडारक आदि तीर्थों में होते ये समुद्र की खाड़ी से जहाज द्वारा कच्छ देश की यात्रा को चले। भयंकर तूफान आने से तीन दिन तक जहाज समुद्र में खड़ा रहा। जेष्ठ का महीना, दो दिन बिना जल के इनका कण्ठ सूखने लगा। ऊपर से दुष्ट म्लेच्छ कटु वचन सुनाते हुए इन्हें समुद्र में फेंकने को तैयार हुए। 
श्री गुरु का स्मरण करते ही वल्लभ कुली गुसाँई का एक जहाज आ गया। उन्होंने इनको जल और प्रसाद दिया। इनका जहाज भी चल पड़ा। सभी विमुख इनकी करामात जान सलाम करने लगे। कच्छ से अंजाड़, भुज नगर होते हुए नारायण सर आए।
 
परम भागवत रामपुरी से भेंट :
नारायण सर में श्री किशोरदास जी को परम चतुर, विज्ञानी, तत्त्वज्ञान निपुण और परम भागवत रामपुरी नामके संन्यासी मिले, जिनकी एक सौ एक वर्ष की आयु थी और उर्द्धव पुण्ड्र तिलक धारण किये हुए थे। उनसे मिलकर प्रेम-भक्तिमयी चर्चा से इनको महासुख मिला। वे श्री स्वामी पीताम्बरदेव जी के शिष्य को भी उनके समान मानते थे। उन्होंने इनसे कहा "मैंने तुम्हारे श्री गुरु की बहुत दिन सेवा की है। उनके मुख से एक गाथा सुनी, सो तुम्हें सुनता हूँ। श्री गुरु परम्परा में श्री स्वामी त्रिभंगदेवाचार्य जी हो गये हैं। वे नारायण सर में वास करते थे। उनके ज्ञान, विज्ञान और भक्ति-प्रेम सम्पन्न वपु को देख त्रिगुणातीत चिद्शकि हिंगुलाज देवी उनकी शरण होने के लिए ललचा उठी। श्री त्रिभंगदेव की स्तुति कर उसने उनसे मंत्र-दीक्षा और श्री वृन्दावन के नित्य केलि रहस्य को प्राप्त किया। तब शुद्ध वैष्णवी बन बलि लेना त्याग दिया। गुरु-दक्षिणा में उसने श्री गुरु को दीर्घायु भेंट की। अब तुम हिंगुलाज के दर्शन करते हुए सम्प्रदाय के आद्याचार्य ब्रजभूषण और ब्रजजीवन के जन्म स्थान काश्मीर जाओ। वहाँ श्रीस्वामी जी के शिष्य श्री प्रकाशदास जी अब भी विराजते हैं, जिनकी रसिक-अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के श्री चरणों में अनन्य प्रीति है।"
 
श्री प्रकाशदास जी से भेंट एवं गुरु कृपा से वैष्णव द्रोहियों से रक्षा :
श्री किशोरदास जी ने अनेक तीर्थ नगर होते हिंगुलाज के दर्शन किये, फिर भ्रमण करते हुए कश्यपपुरी आये। फिर नागार्जुन आदि तीर्थों में भ्रमण करते क्षीरभवानी के दर्शन करके प्रसन्न हुए। इनके साथ आठ साधु भी थे। क्षीरभवानी में विप्रगण सतत यज्ञ करते रहते थे। वे शाक्त ब्राह्मण इन सबके वैष्णव रूप को देख मत्सरता से क्रुद्ध हो उठे और कटु वचनों की वर्षा करने लगे। यहाँ तक कि क्षुब्ध बीसों द्विज इनकी कण्ठी को तोड़ने के लिए दौड़े। श्री किशोरदास जी ने श्री गुरुदेव का स्मरण किया। तत्क्षण श्री गुरु ने सहायता की। इनके पास ही एक सरोवर के किनारे हराभरा मैदान था। उसमें से एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसके शरीर से अनल और भानु के समान किरणें निकल रही थीं। उनके उज्ज्वल विशाल भाल पर उर्द्धव-पुण्ड्र (तिलक), गले में तुलसी की युगल कण्ठी, विशाल बाहुयुत अधिक ऊँचा शरीर, कटि में कोपीन और हाथ में करुवा (कमण्डल) था। प्रसन्न मुखयुत गज की चाल से चलकर वे इनके निकट आये। ये सब उनके दर्शन कर परम सुखी हुए। वे प्रणाम कर बोले "तुम सब सन्त, सबके सम्माननीय पूज्य हो। चारों सम्प्रदाय के सन्त ब्रह्म रूप हैं।" फिर उन्होंने श्री किशोरदास जी के संग आये सन्तों के पृथक्-पृथक् नाम, गुरु, स्थान आदि के भेद बताये। पश्चात् श्री किशोरदास जी के प्रति सतगुरु सेवक के समान विशेष प्रीति दर्शाई।
यह देख-सुन यज्ञ करनेवाले और भी द्विज उठकर दौड़े चले आए और हाथ जोड़े भय से चकित हुए खड़े हो गये। उनको लक्ष्य करके वे महापुरुष- श्रीप्रकाशदास जी कहने लगे "वेद-पुराण ने सबका सार श्रीहरी की भक्ति का निर्द्धार किया है। मनुष्य शरीर पाकर जो हरि से दीन नहीं हैं, उनकी भक्ति नहीं करते, वे अधम, अकुलीन, मलिन, शूद्र हैं और जो हरि के अनुकूल हैं, उनकी भक्ति करते हैं, वे शूद्र होने पर भी परम कुलीन तथा मुनिवत् अविकारी हैं। सतगुरु चरणों में जिनकी प्रीति नहीं हैं, उन्होंने उत्तम द्विज तन प्राप्त कर भी क्या कर लिया? श्री हरि की भक्ति-सेवा बिना समस्त धर्म-भ्रममय और मलिन हैं। जो गले में तुलसी की कण्ठी, मस्तक पर उर्द्धव-पुण्ड्र और मुख में युगल मंत्र या गोपाल मंत्र धारण करते हैं, वे वर्णाश्रमियों के ईश हैं। उनके विद्वेषी सब पाखण्डी और धर्मराज के दण्डभागी हैं। जो जन सन्त से द्रोह करते हैं, वे अत्यन्त नीच और पतित हैं। उन्होंने अपना सर्वस्व नष्ट कर लिया। जंगम (चल) तीर्थ संत हैं। जिनके वचनवारि में स्नान कर मलिन जन तन-मन से शुद्ध पवित्र हो जाते हैं।"
फिर उन्होंने श्री किशोरदास जी के सिर पर हाथ फेरा। इन्होंने उनके चरण हुए। उन्होंने निधुवन का वर्णन करते हुए श्री स्वामी हरिदास जी महाराज, श्री वीठलविपुल देव जी, श्री बिहारिणिदेव जी, श्री सरसदेव जी, श्री नरहरिदेव जी, श्री रसिकदेव जी, और श्री पीताम्बर देव जी का सुयश सुनाया। फिर प्रसन्न होकर बोले "तुम्हें तीन मास यहाँ रहना है। फिर कष्टबाड़ में दस दिन रहकर भूटान की भूमि का दर्शन करते हुए गौतम ऋषि का दर्शन करना।" ऐसा कह श्री प्रकाशदास जी चले गये।
ऐसी घटना देख विप्रगण बहुत डर गये और इनकी स्तुति करने लगे।
 
सिद्ध लोक का दर्शन :
काश्मीर में तीन माह निवास कर श्री किशोरदास जी भ्रमण करते हुए कष्टबाड़ पहुँचे। वहाँ साधु पुरुषोत्तमदास जी मिल गये। ये दोनों भूटान गये। अनेक वन, पर्वत और नदी आदि का दर्शन करते एक दिन दुग्ध गंगा में स्नान कर उसके किनारे स्वच्छ, रमणीय शिला पर अपना पाठादिक नित्य कर्म किया। चलने की तैयारी करते ही एक किशोर वयसा अति सुन्दर रमणी प्रकट हुई और इनसे कहने लगी "इस अच्युत उद्यान में जाओ, वहाँ गौतम ऋषि के दर्शन पाओगे।" यह सुनते ही श्री प्रकाशदास जी के वचनों की सुध कर श्री किशोरदास जी आगे बढ़े। कुछ चल कर पीछे फिर देखा, तो वह सुन्दरी नहीं दीखी। तब इन्होंने जाना कि श्री गुरु ने कृपा कर देवी के मुख से राह बताई है। सेव, आडू आदि अनेक, फल-फूलों से भरे अच्युत उद्यान को देख इनका मन प्रफुल्लित हो उठा। वहाँ एक गुफा दिखाई दी, जिसके द्वार पर चार सौ मनुष्यों के बैठने के योग्य एक विशाल शिला देखी। उस पर ये दोनों बैठ गये। तब अचानक पवन का एक झोंका आया। उसको स्पर्श करते ही इनके तन-मन अति प्रसन्न हो उठे और सहज निर्वेद दशा उदित हो आई तथा इष्ट स्वरूप की झाँकी सहज हृदय-नयनों में बस गई। एक प्रहर तक इन्होंने ऐसा सुख पाया, फिर मध्याह्न समय हो आया।
प्राकृतिक-मायिक आवरण दूर होते ही जैसे श्री हरि के दर्शन होने लगते हैं, ऐसे ही गुफा का बाह्य रूप लुप्त हो गया और उसमें अद्भुत, उज्ज्वल प्रकाश दिखने लगा। हरित द्रुमावली, किल्लोल करते हुये खग, जल से भरे सरोवर, हरित भूमि और निर्मल आकाश दिखने लगा। भारी आर्ष शब्द हुआ। अब भवन ( गुफा) में बहुत से ऋषियों के दर्शन हुए। वे सब सनकादिकों के परमहंस वेष में थे और सिर में सचिक्कन केश, आड़बंध, कोपीन, तिलक-छाप, माला धारण किए हुए तथा समान वय-स्वरूपवान् थे। हाथ जोड़े हुए वे मत्त गज की चाल से पूर्व से पश्चिम में चले, फिर वहाँ वापस आ गये। दो घड़ी तक इनको यह दृश्य दिखाया, फिर अदृश्य कर लिया। ऐसे ही सायंकाल, अर्धनिशा और प्रातःकाल स्वरूप दर्शाया। फिर इनके मन में ऐसा भय उत्पन्न कर दिया, जैसे सौ सिंह पीछे लग गये। ये दोनों वहाँ से भागे। कोसों तक भागते-भागते जब वास्तविक मार्ग पर आ गये, तब भय दूर हुआ। आगे चल ये मार्ग भूल गये और विकट भयंकर वन में प्रवेश कर गये। रात्रि होने से गुफा के आगे एक शिला पर विश्राम किया। रात्रि में भयंकर विकराल राक्षस गुफा से निकला तो ये अत्यन्त भयभीत हो गये। श्री गुरु श्री स्वामी के स्मरण प्रभाव से उस दुष्टात्मा ने इनका सम्मान करते हुए दूध पिलाया। ये वहाँ से आगे चलें।
 
देवों के दर्शन :
प्रभा ज्योति पर्वत पर रविगंगा है, जिसके तट पर सूर्यकुण्ड में आश्विन कृष्णा सप्तमी को रथ सहित सूर्य भगवान के दर्शन होते हैं। सन्तों के मुख से यह सुन उनके साथ श्री किशोरदास जी ने पुष्प फलों से लदे रमणीय पर्वत पर चढ़कर रविगंगा में स्नान किया। रात्रि में चार घड़ी बीतने पर इन्हें मोर के उड़ने के शब्द की भाँति अदृश्य देव विमानों के आने की ध्वनि सुनाई दी और देव शरीरों की सुगंध भी आई। अर्द्ध रात्रि तक ऐसा होते रहा, तत्पश्चात् अनेक वाद्यों और नृत्य, गीत सहित राग-रागिनियों की ध्वनि सुनाई दी, चार घड़ी रजनी शेष रहने पर संगीत ध्वनि बंद होने लगी और विमानों के प्रस्थान की ध्वनि सुनाई दी। सबेरे सूर्य कुंड में सूर्य भगवान् के दर्शन करते हुए वे पहाड़ से नीचे उतरे। चढ़ते समय चौबीस साधु थे, उतरने पर पाँच घट गये इसका कारण कोई नहीं जान सका।
 
सुकेतपुर में सिंह से रक्षा :
श्री किशोरदास जी वहाँ से चल कर चन्द्रभागा और व्यासगंगा में स्नान करते हुए रहुबालसर में जल ऊपर पर्वत को तैरते देख इन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। वहाँ से सुकेतपुर में बारह दिन निवास किया। इस नगर में सिंह का बड़ा आतंक था। वह पुर में घुस आता और मनुष्यों को खा जाता था। उसके भय से सब द्वारों को बन्द करके सोते थे। ये बाहर चौगान में रहते थे, लोग इन्हें मना करते रहते। एक दिन अर्द्ध रात्रि में गर्जना करता हुआ सिंह आया। श्री गुरु का स्मरण करते हुए ये निर्भय बैठे रहे। वह घुर्राता हुआ चार घड़ी तक इनके सम्मुख खड़ा रहा, फिर अपने आप ही वन में लौट गया।
प्रातः नर-नारी इनकी पूजा स्तुति करने लगे।
 
अवधूत महात्मा से भेंट एवं हाटकेश्वर महादेव का चमत्कार :
श्री किशोरदास जी वहाँ से ज्वालामुखी, कोट काँगड़ा, सतलज आदि तीर्थ स्थानों में होते हुए हरिद्वार, ऋषिकेश आये। देव प्रयाग, श्री नगर, केदारनाथ, तुंगनाथ और बद्रीनाथ गये। फिर ये विष्णु प्रयाग, कर्ण प्रयाग, होते हुए हरिद्वार आयें। वहाँ से शुकताल, गढ़मुक्तेश्वर से कुरुक्षेत्र आए। वहाँ हाटकेश्वर शिव मंदिर में इन्हें एक अवधूत मिले। उन्होंने पूछा "तुम कौन हो? कहाँ से आये? कहाँ निवास है? और अब कहाँ जा रहे हो?"
अवधूत के वचन सुनकर ये बोले "हम अच्युत कुल- श्री हरि के दास हैं। रसिक-अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के चरणों में हमारा दृढ़ विश्वास है और वे ही हमारे मूल आचार्य हैं। निम्बार्क सम्प्रदाय है और सदा श्री गुरु के आश्रय में रहते हैं। श्री वृन्दावन हमारा निवास स्थान है। अब उत्तर दिशा आये हैं और वृन्दावन जाने की आशा है।"
यह सुन अवधूत अति प्रसन्न हुए, कहने लगे "सनक सम्प्रदाय सबसे श्रेष्ठ और सृष्टि के आदि से विराजित है। तुम्हारे इस कुल में श्री बलभद्राचार्य जी महान् प्रतापी हुए। वे कुछ समय इस स्थान पर बसे और परम तत्त्व का निर्द्धार किया।" यह सुनकर शाक्त द्विज दौड़े आए और शठवत् कर्कश वचन सुनाने लगे। द्विज गण श्रुति-स्मृति युत रुद्रादिक के स्वरूप का मण्डन करते, तो आचार्य अपने इष्ट के सुयश गाते। जब आचार्य ने इनके हठ को देखा, तो बोले "तुम सच्चे शिव-शक्ति के भक्त हो, तो शिव के निकट जाकर विनय करते हुए हम दोनों के मत को उन्हें सुनाओं और उनसे तत्त्व का निर्णय माँगो।"
आचार्य श्री की बात सुन ब्राह्मणों ने हाटकेश्वर के आगे निवेदन किया। मंदिर से सबको स्पष्ट वाणी सुनाई दी "बलभद्राचार्य जी धन्य-धन्य हैं। उन्होंने अद्भुत सनातन परम भागवत धर्म धारण किया है। जो द्विज होकर संत के द्रोही होता है, उसके समान कोई अधम नहीं है।" शिव के वचन सुनते ही विप्रों ने डर कर आचार्य श्री की शरण ली। सो हाटकेश्वर परम भागवत हैं।
अवधूत की वाणी सुन श्री किशोरदास जी प्रसन्न हुए।
 
लोहागढ़ में चमत्कार :
श्री किशोरदास जी वहाँ से चलकर लोहागढ़ के निकट आये और एक आश्चर्य देखा। पर्वत के पास छोटे उज्ज्वल मनोहारी स्थान में एक भवन देखा, जिसके बन्द द्वार के भीतर प्रज्ज्वलित अग्नि के समान देहवाला एक पुरुष दिखायी दिया। द्वार के आगे सुन्दर चौंतरा पर ये बैठ गये। एक पहर रात बीतने पर एक सुन्दर स्त्री चून लेकर आई। तब इन्होंने पूछा "तुम कौन हो?"
वह स्त्री बोली "जो तू चाहता है।" ऐसा कह वह भीतर प्रवेश कर गई। तब उस पुरुष ने द्वारा खोल दिया। एक घड़ी पश्चात् वह पुरुष गरम-गरम महा प्रसाद (सिद्ध चावल) और घृत लेकर आया। ये अति क्षुधित तो थे ही उस सुगन्ध युत स्वादिष्ट महाप्रसाद (भात) को तत्काल खा गये। तब उस पुरुष ने कुटिया में प्रवेश कर द्वार बंद कर लिया। थके होने से ये निद्रा के वशीभूत हो गये।
सबेरे उठने पर इन्हें न भवन दिखा, न पुरुष और न स्त्री। ये आश्चर्य चकित हो गये। लोहागढ़ में भी पूछने पर इसका मर्म कोई भी न बता सका।
 
जयपुर आगमन एवं गुरु से भेंट :
श्री किशोरदास जी वहाँ से जयपुर आकर श्री गुरु-चरणों के दर्शन कर ये अति प्रफुल्लित हो उठे। अमित स्नेह की वृष्टि करते हुए श्री स्वामी पीताम्बरदेव जी ने इन्हें अपने निकट रखा। श्री किशोरदास जी श्री गुरु के साथ श्री वृन्दावन आये और उनकी आज्ञा से श्री रसिकबिहारी की सेवा करने लगे। श्री गुरु ने योग्यपात्र जान अपने निजमत-नित्यविहार-अनन्य धर्म का इनके उर में प्रकाश किया और इन्हें नित्य केलि रस से परिपूर्ण कर दिया। ये मीनवत् रससिन्धु में मत्त, मग्न, विभोर हो, निमज्जित-उन्मज्जित होने लहराने लगे।
श्री किशोरदास जी निज उपासना-नित्यविहार रस तत्त्व के महान् वेत्ता थे। जिन्होंने श्री गुरु-आचार्यों की वाणी के गूढ़ आशय को भली-भाँति, पहचाना। ये उसके रहस्य रस के परम मर्मज्ञ थे। ये अहर्निश दम्पती युगल किशोर के नित्य क्रीड़ा रस में मग्न रहते थे। इनकी रचना अत्यन्त ललित, मधुर, कोमल पदों से युक्त है। इनका वाणी साहित्य प्रभूत है। अपने निजी सिद्धान्तों को "निज मत सिद्धान्त" काव्य में ग्रथित करके समस्त आचार्यों के चरित्रों को इन्होंने ललित काव्य पूर्ण शैली से संकलित किया है। ये बड़े उदार, नम्र, सरल और अतीव भावुक थे।
विद्वद्वर्य श्री हरिवल्लभ जी ने इनकी प्रशंसा में लिखा है:--
 
किसोर हिये में किसोर बसै तहिं मो हिय ठौर किसोर बसै।
हरि ध्यान सच्यौ सुमच्यौ मधु रूप लच्यौ सुख में गनिवे कौं जसै।
हरिबल्लभ कौं निज बल्लभ जानि कही करिवे तिन ये मरसै।
रचि आदि हि तें करि भाषा भागौत हि मो चित यौं अभिलाष लसै।
 
श्री हरि-गुरु-संत चरणों में अत्यंत प्रीति होने से संत विद्वत् जनों द्वारा "भावुकं विश्ववन्द्यं हृद्यं प्रेमभाजम्" कहके इनकी स्तुति की गई है।
 
श्री युगल विहारी जी की सेवा :
श्री स्वामी पीताम्बरदेव जी जयपुर से युगल बिहारी के मधुर विग्रह बनवा लाये। इस सुन्दर मधुर जोड़ी को निरखकर श्री स्वामी रसिकदेव जी अति प्रसन्न हुए। युगल विहारी सुन्दर नाम रखा। सूरजघाट पर एक कुंज में पधराकर श्री स्वामी पीताम्बरदेव जी वहीं रहकर सेवा-भजन करने लगे। पीछे श्री किशोरदास जी को यह कुंज सौंप दी। ये वहाँ के महान्त कहलाये। यह कुंज बिहारीपुरा में नन्दभवन (रतनलाल जी की धर्मशाला) की बगल वाली गली में है।
 
रचना :
महंत श्री किशोरदास जी सम्प्रदाय के प्रथम इतिहासकार हैं। वे प्रकाण्ड पंडित थे और कल्पनाशील, काव्य-कलामर्मज्ञ भी। उनका "निजमत सिद्धान्त" " छन्दोबद्ध इतिहास क्या पुराण है। इसकी रचना दोहा-चौपाइयों में हुई है। बीच-बीच में अन्य छन्दों का प्रयोग भी किया गया है। आद्याचार्य जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य जी से लेकर द्वादश आचार्यों तथा श्री देवाचार्य से लेकर रसिक-शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज और अष्टाचार्यों का जीवन चरित्र, सिद्धान्त एवं गुरु-शिष्य परम्परा भी इसमें विस्तार से प्राप्त है। अवसर के अनुकूल उन्होंने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और उपदेश आदि बातों का भी "विज्ञान-गीता" एवं अन्य स्थानों पर समावेश कर दिया है। रस, अलंकार तथा गुण की दृष्टि से 'निजमत' शून्य नहीं। इस प्रकार यह भक्ति का एक विशाल संदर्भ-ग्रंथ है। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि यदि "निजमत सिद्धान्त" पर ही विचार किया जाय तो इनकी कीर्ति स्थायी रखने के लिये वही पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त उनका रचा हुआ और भी विपुल वाणी-साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। ये समस्त रचनाएँ श्री किशोरदास जी के स्वहस्त से लिखी गई हैं और हस्तलिखित प्रति में उनके हस्ताक्षर भी हैं। लिखा भी है :
"लिषतं श्रीवृंदावनधांम मधे दसकत स्वयं"
 
उनके सिद्धान्त की रचनाओं का एक विशाल संग्रह "सिद्धान्त रत्नाकर" के नाम से प्रकाशित किया गया था। इनके रचनाकाल का कहीं उल्लेख नहीं मिलता; श्री वासुदेव गोस्वामी ने “निजमत-सिद्धान्त" का रचना काल सं० 1820 वि० के लगभग अनुमान किया है। अतः उनका रचनाकाल वि० सं० 1810 से 1830 के बीच में माना जा सकता है।
 
निकुञ्जवासी लाला श्री शालग्राम जी वैश्य कानपुर के निजी वाणी-संग्रहालय में महंत श्री किशोरदास जी की शृंगार-रस की हस्तलिखित वाणी प्राप्त हुई। इसमें प्रेमानन्द-पच्चीसी, श्री वृन्दाविपुन विलास, नेह्-तरंग, वर्षोत्सव और आचार्योत्सव आदि रचनाओं का संकलन है। यद्यपि ये सब कलेवर में छोटी-छोटी ही कृतियाँ हैं, फिर भी इनका अपना अलग महत्व है। इन रचनाओं में श्री श्यामा-श्याम के रूप-सौन्दर्य, आसक्ति, प्रगाढ़ प्रेम और केलि विलास आदि विषयों का हृदयग्राही चित्रण है। वर्षोत्सव में बसंतोत्सव से लेकर विहार-पंचमी तक के वर्ष भर के श्री लाड़िली लाल के विविध उत्सव महोत्सवों का ललित कोमल-कान्त पदों में अद्भुत वर्णन है, जो देखते ही बनता है। आचार्योत्सव में आद्याचार्य जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य जी की बधाइयों के पश्चात् स्वामी श्री आशुधीर देव जी से लेकर स्वामी श्री पीताम्बरदेव जी तक समस्त आचार्यों की जन्म-बधाइयों का क्रमशः रसमय वर्णन मिलता है। इसकी यही एक मात्र प्रतिलिपि हमारी जानकारी में सम्प्रति समुपलब्ध है, जो मिति आषाढ़ शुक्ल 4 रविवार, सं० 1954 वि० को पूर्ण हुई थी। इसे पुजारी श्री बंदीदीन ने लिखा है। इनकी जो रचनाएँ अभी तक प्राप्त हुई हैं, उन्हें निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।
ऐतिहासिक रचनायें :
1. निजमत सिद्धान्त; आदि, मध्य, अवसान और आचार्य खंड
2. स्वामी श्री आशुधीरदेव जू को चरित्र
3. स्वामी श्री विहारिणदेव जू को चरित्र
 
सैद्धान्तिक रचनायें :
1. सिद्धान्त-सरोवर
2. सिद्धान्त-सार-संग्रह
3. अद्भुत आनन्द सत
4. उपदेश-आनन्द-सत
5. सवैया-पच्चीसी
6. फुटकर कवित
 
शृंगारिक रचनायें :
1. प्रेमानन्द-पच्चीसी
2. श्री वृन्दाविपुन- विलास
3. नेह-तरंग
4. वर्षोत्सव
5. आचार्योत्सव
 
महंत श्री किशोरदास जी का अध्ययन विशाल था। उन्होंने श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद् आदि दार्शनिक ग्रंथों का तथा सूर, तुलसी, कबीर आदि संत कवियों की वाणियों का अच्छा अध्ययन किया था; ऐसा स्पष्ट आभास उनकी रचनाओं में मिलता है। आपकी भाषा बड़ी रससिक्त और ओज, प्रसाद, माधुर्य आदि गुणों से परिपूर्ण है। रसपेशलता तथा चित्रोपमता उसके प्रधान गुण हैं। अलंकारों का प्रयोग आपकी कृतियों में प्रचुरता के साथ हुआ है। यह प्रयोग केवल प्रयोग के लिए नहीं बल्कि स्वाभाविक हैं। भाषा और प्रवाह के साथ अलंकार अपने आप बहे चले आाये हैं। इन अलंकारों में अनुप्रास तथा यमक, शब्दालंकारों का प्रयोग अच्छा बन पड़ा है। शब्द-योजना, छन्द-रचना और अलंकार सौष्ठव आदि सभी दृष्टि से वे कलाकुशल सिद्धहस्त श्रेष्ठ कवि सिद्ध होते हैं।