अष्टसिद्धि नवनिधि के सुखको वेपरवाहि लुटावेंगे - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (119)

अष्टसिद्धि नवनिधि के सुखको वेपरवाहि लुटावेंगे - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (119)

(राग लावनी)
अष्टसिद्धि नवनिधि के सुखको वेपरवाहि लुटावेंगे ।
चौदोभवन त्रिलोकी संपति वायें हाथ वहावेंगे ।। [1]
ललितकिशोरी जब श्रीवनमें कुंज वसेरो पावेंगे ।
हंस हंसके तब ब्रह्मानंद की गलियों धूरि उडावेंगे ।। [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (119)

हम अष्ट सिद्धि और नौ प्रकार की निधियों को बेपरवाह हो कर लुटा देंगे । हम चौदह भवन और त्रिलोक की संपति को भी बहा देंगे । [1]

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि जब हमें वृंदावन में किसी कुंज का वास प्राप्त हो जाएगा तब हम उसके समक्ष ब्रह्मानंद को भी लुटा देंगे और वृंदावन की रज को ही अपना सर्वस्व धन मानेंगे । [2]