बाँकी पाग चन्द्रिका तापर तुर्रा रुरकि रहा है - श्री सहचरीशरण देव, सरसमंजावली (29)

बाँकी पाग चन्द्रिका तापर तुर्रा रुरकि रहा है - श्री सहचरीशरण देव, सरसमंजावली (29)

(सवैया)
बाँकी पाग, चन्द्रिका, तापर तुर्रा रुरकि रहा है।
वर सिरपंच, माल उर बांकी, पट की चटक अहा है॥ [1]
बाँके नैन, मैन-सर बाँके, बैन-विनोद महा है।
बाँके की बाँकी झाँकी करि, बाकी रही कहा है॥ [2]

- श्री सहचरीशरण देव, सरसमंजावली (29)

अनंत-अनंत सौंदर्य-माधुर्य-निधि ठाकुर श्रीबांकेबिहारीजी महाराज के सिर पर बंधी टेढ़ी पाग सुशोभित हो रही है। पाग पर चन्द्रिका और तिरछे लगे तुर्रे की शोभा बड़ी ही निराली है। सुन्दर सुसज्जित सिरपंच और उर-स्थल पर ढुलक रही वनमाला का बाँकापन तथा अंग-अंग में धारण किये वस्त्रों की अद्भुत चटक को देख-देखकर मन मुग्ध हो रहा है। [1]

कामदेव के विषम वाणों को तिरस्कृत करने वाले रतनारे नेत्रों से कटाक्षों की वर्षा हो रही है। अरुणाभ अधरों से वचन माधुरी का अमृत रस झर रहा है। ऐसे अद्भुत ठाकुर की दिव्यातिदिव्य विशुद्ध रसमयी बाँकी झाँकी का दर्शन कर लेने पर भी कुछ करना शेष रह जाता है, यह हम नहीं जानते। [2]