मिलन्ति चिन्तामणि कोटि कोटयः स्वयं बहिर्दुष्टि मुपैति वा हरिः।
तथापि वृन्दावन धूलिधूसरं न हेदमन्यत्र कदापि यातु मे ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.23)
यदि [वृंदावन के अन्यत्र] कोटि कोटि चिन्तामणि स्वयं ही आकर प्राप्त हों और यदि श्रीहरि भी स्वयं नेत्रों के सामने दर्शन दें, तथापि श्रीवृन्दावन धूल-धूसरित यह मेरा शरीर (श्रीवृन्दावन की सीमा के बाहर) अन्यत्र न जाए-यही मेरी प्रार्थना है।
तथापि वृन्दावन धूलिधूसरं न हेदमन्यत्र कदापि यातु मे ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.23)
यदि [वृंदावन के अन्यत्र] कोटि कोटि चिन्तामणि स्वयं ही आकर प्राप्त हों और यदि श्रीहरि भी स्वयं नेत्रों के सामने दर्शन दें, तथापि श्रीवृन्दावन धूल-धूसरित यह मेरा शरीर (श्रीवृन्दावन की सीमा के बाहर) अन्यत्र न जाए-यही मेरी प्रार्थना है।

