(राग सारंग)
प्यारी तेरी पुतरी काजर हू तैं कारी
मानौं द्वै भँवर उड़े री बराबरि ।
चंपे की डार बैठे कुंद अलि लागी है जेब अराअरि ।। [1]
जब आनि घेरत कटक काम कौ तब जिय होत डराडरि ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी दोऊ मिलि लरत झराझरि ।। [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (71)
हे प्यारीजी [राधे], आपके नयनों की पुतली काजल से भी काली मानों दो भँवर रूप रस पान करने के लिए उड़ उड़ मँडरा रहे हैं। सुनहरे चम्पे के वृक्ष पर कुंदन की कली पर भँवर बैठी हैं, उनकी प्रतिद्वंद्विता सुंदर दिखती है। [1]
जब कामदेवों की सेना आकर उन्हें घेर लेती है, तब उनका हृदय भयभीत हो जाता है। श्री हरिदास जी के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी दोनों मिल-मिलकर अंग-संग विहार में रत हैं, श्यामा ज़ू के दो नयन [भँवर] नित्य श्यामसुंदर को प्रहार कर रहे हैं, प्रेम रस की मानो झरी सी लगी हुई है। [2]
प्यारी तेरी पुतरी काजर हू तैं कारी
मानौं द्वै भँवर उड़े री बराबरि ।
चंपे की डार बैठे कुंद अलि लागी है जेब अराअरि ।। [1]
जब आनि घेरत कटक काम कौ तब जिय होत डराडरि ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी दोऊ मिलि लरत झराझरि ।। [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (71)
हे प्यारीजी [राधे], आपके नयनों की पुतली काजल से भी काली मानों दो भँवर रूप रस पान करने के लिए उड़ उड़ मँडरा रहे हैं। सुनहरे चम्पे के वृक्ष पर कुंदन की कली पर भँवर बैठी हैं, उनकी प्रतिद्वंद्विता सुंदर दिखती है। [1]
जब कामदेवों की सेना आकर उन्हें घेर लेती है, तब उनका हृदय भयभीत हो जाता है। श्री हरिदास जी के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी दोनों मिल-मिलकर अंग-संग विहार में रत हैं, श्यामा ज़ू के दो नयन [भँवर] नित्य श्यामसुंदर को प्रहार कर रहे हैं, प्रेम रस की मानो झरी सी लगी हुई है। [2]

