श्रीहित कमलनैंन जी की जीवनी

श्रीहित कमलनैंन जी की जीवनी

जन्म :
गोस्वामी कमलनैंन जी श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के वाणीकारों में अन्यतम हैं। इनका जन्म श्रीहित कुल में 1635 की आषाढ़ कृष्णा पंचमी के दिन वृन्दावन में हुआ था। जयकृष्णदास जी ने 'हित कुल शाखा' में इनका जन्म काल इन शब्दों में लिखा है -
 
संवत कहि-कहि हिय हरषात। सोरहसै वानवा विख्यात॥
बदि असाढ़ पाँचैं सुख भारी। श्रीकमलनैंन जनमे सुखकारी॥
 
उस समय इनके पिताश्री गो. रासदास जी और पितामह गो. दामोदरवर जी का वृन्दावनस्थ श्रीराधाबल्लभ मन्दिर पर वंशानुगत आधिपत्य था। वे श्रीराधाबल्लभ मन्दिर वृन्दावन के सेवाधिकारी थे।
 
बाल्यकाल एवं दीक्षा :
गोस्वामी कमलनैंन जी की शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कैसे हुई यह अज्ञात है किन्तु इनकी रचनाओं का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि ये अनेक शास्त्रों के ज्ञाता थे। ब्रजभाषा तो इनकी मातृभाषा थी; अतः उस पर तो इनका पूर्ण अधिकार था ही साथ ही संस्कृत भाषा का भी इन्हें पर्याप्त ज्ञान था।
गोस्वामी कमलनैन जी ने एक स्थल पर संश्लिष्टार्थ परक शब्दों में गो. दामोदरवर का सादर स्मरण किया है। कोई आश्चर्य नहीं कि इन्हें हित धर्म की दीक्षा अपने पितामह गो. दामोदरवर जी से ही प्राप्त हुई हो।
 
आध्यात्मिक जीवन :
गो. रासदास जी ने अपने जीवन काल में (1663 के फालगुन शुक्ल 13 को) ही गोस्वामी कमलनैन जी को श्रीराधाबल्लभ मन्दिर का सेवाधिकार पत्र लिख दिया था; क्योंकि ये उनके तीनों पुत्रों में ज्येष्ठ तो थे ही साथ ही इस पद के लिये सर्वथा उपयुक्त भी थे। एतावता गो. रासदास जी के निकुंज गमनोपरान्त ये श्रीराधाबल्लभ मन्दिर के अधिकारी हुए।
गो. कमलनैन जी ने श्रीराधाबल्लभ मन्दिर का सेवा प्रबन्ध तो अपने पिताश्री के निकुंज गमन (पौष शुक्ला पूर्णिमा 1665) के पश्चात् ही सम्हाल लिया था किन्तु अधिकारी पद का तिलक चिर वृद्ध परम्परानुसार 1666 की कार्तिक शु. त्रयोदशी को ही किया गया।
गोस्वामी जी की सम्पूर्ण प्रियता तो अपने परमोपास्य में ही केन्द्रित हो चुकी थी। अतः ये श्रीहिताचार्य द्वारा आविर्भूत विधि निषेध शून्य सेवा प्रणाली के अनुसार आजीवन श्रीराधाबल्लभलाल जी को लाड़ लड़ाते रहे -
 
श्रीराधाबल्लभ लाड़हीं, कृपा सुदत फल पायौ।
भक्ति-बेलि रहे लहलही, सुख दिन-दिन सरसायौ॥
 
स्वेष्ट श्रीराधाबल्लभलाल जी के बसन्त, होरी, होरीडोल, झूला, वनबिहार तथा विवाह आदि उत्सवों पर तो इनके हार्दिक उत्साह की लहरें तीव्र वेग के साथ उमड़ उठतीं थीं -
 
आवहीं बढ़ि लहर प्रभु दुलराइवौ, चित चाइ सौं।
सजत नव-नव रीति उत्सव, हियें हित के भाइ सौं॥
आनंददायक सबहि लाइक, कृपा अति रंग बरसने।
जै जै श्रीअम्बुज नैंन रूप प्रभु दरसने॥
 
गोस्वामी कमलनैंन जी की अभिरुचि अपने पूर्व रसिकाचार्यों द्वारा प्रणीत वाणियों का कथन श्रवण करने में बहुत अधिक थी। जब ये अपनी सहज मृदुल और महा मधुर वाणी में श्रीहित मूर्ति श्यामा-श्याम की केलि कथा का कथन किया करते थे तब रसिकजन रसानन्द से परिपुष्ट हो जाते थे। चाचा वृन्दावनदास जी ने गोस्वामी जी के इस रूप का सुचारु चित्रण निम्नांकित छन्दों में किया है -
 
कोमल मधुर अलाप, सकल सन्तनि सुखदाई।
गिरा प्रेम रस सनी, भावना दृग दरसाई॥
सभा शिरोमणि रसिक, प्रीति सबसौं परिपारत।
सुजननि उर आनन्द देत, रसरीति-उचारत॥
चरन सरम जे अनुसरे. ते सब भये प्रवीन जन।
श्रीकमलनैंन सुखदैंन कौं, प्रगट कियौ आनंद तन॥
 
शास्त्रों में महापुरुषों के जो लक्षण वर्णन किये गये हैं, प्रायः वे सम्पूर्ण लक्षण गोस्वामी जी में विद्यमान थे। उनका हृदय एक ओर तो नवनीत जैसा कोमल था तो दूसरी ओर सागर जैसा अगाध, अपार एवं गम्भीर था -
 
जै जै श्रीअम्बुज नैंन, रूप प्रभु दरसने।
उर वर अति गम्भीर, भाव नव सरसने॥
सागर मनहुँ अछेह, पार को पावहीं।
सुमति प्रसंशत रहत, लहर बढ़ि आवहीं॥
 
इनकी मधुर वाणी में कोई विशेष आकर्षण था। वे सभी को सम्मान देने में ही अपना सम्मान समझते थे और स्वयं अमानी बने रहते -
 
बैंन अमी के ऐन, दैन सनमान कौं।
रसना ललकति रहति, इष्ट-गुन-गान कौ॥
गुन-गान की मन ललक, मृदु नवनीत मानौं द्रवित है।
गिरा हिलगनि माहिलैं सुख, रस अलौकिक श्रवित है॥
 
गो. कमलनैंन जी की कुञ्ज :
गो. रासदास जी द्वारा प्रदत्त सेवाधिकार पत्र से ज्ञात होता है कि इन्हें श्रीराधावल्लभ मन्दिर, मन्दिर सेवा सम्बन्धी अनेक कुंज, बैठक, बाखर (चौक) और भंडार आदि की भूमि तो पैत्रिक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुई ही थी, साथ ही 'वृन्दावन प्रकाश माला' के वर्णनानुसार यह भी पता चलता है कि गो कमलनैंन जू की कुंज किंवा गो. कमलनैंन जी का निजी निवासालय वृन्दावन परिक्रमा पथ में उस स्थल पर था जहाँ एक ओर तो ताँती बड़भागी की कुंज में स्थित सिंगारवट है और दूसरी ओर श्रीहित रासमण्डल है। यह कुंज गो. कमलनैंन जी की इच्छानुसार भक्तवर जवाहरसिंह जी ने निर्मित कराई थी। उन्होंने यहाँ फूलों का एक बृहद बगीचा भी लगवाया था। 'वृन्दावन प्रकाश माला' रचयिता गो. चन्द्रलाल जी ने इस कुंज के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन करते हुए लिखा है कि यहाँ पुष्पोद्यान के बीचों बीच एक सुन्दर बँगला बना हुआ है। बँगले के दक्षिण पार्श्व और वाम पार्श्व में बने प्रशस्त मार्ग उसकी शोभा वृद्धि करते हैं। कुंज में बने महली घाट की शोभा तो अकथनीय ही है। जहाँ पर रेवज नामक फूलों की सुगन्ध महकती रहती है -
 
कोठी सौं लै कुंज तल, मारग सुखद सुजान।
मिलत निवारि-कदम्ब ये, राखत सबकौ मान॥ 
ताकैं आगे घाट है, महली कह्यौ न जात।
अवली रेवज कुसुम की, अति सुगन्ध महकात॥
 
बँगला और बँगले के नीचे से जाने वाले मार्ग को भी जमुना जी ने अपनी रज से ढँक लिया है। बँगले के ऊपरी भाग के कुछ दर्शन होते हैं और इस ऊपरी भाग के ऊपर बंगीय साधुओं ने 'झाडू मण्डल' नामक एक स्थल बना लिया है।
 
श्री राधावल्लभ जी का स्वप्न आदेश :
ऐतिहासिक ग्रन्थों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 1669 के अन्त में तत्कालीन मुस्लिम बादशाह औरंगजेब ने ब्रज पर घमासान आक्रमण किया था। धर्मान्ध बादशाह ने ब्रजस्थ अनेक मन्दिरों को ध्वस्त किया था, जिनमें वृन्दावन के श्रीराधावल्लभ जी. गोविन्ददेव जी. मदनमोहन जी, गोपीनाथ जी तथा जुगलकिशोर जी आदि ठाकुरों के मन्दिर प्रमुख थे। मन्दिरों में विराजमान श्रीविग्रहों की रक्षा करने के लिये कतिपय गोस्वामी गणों एवं सन्तजनों ने अपने प्राण भी विसर्जन किये। इस विनाशकारी आक्रमण से बचने हेतु वृन्दावन के अनेक गोस्वामी गणों, भक्त-वृन्दों और पुजारियों ने अपने-अपने सेव्य स्वरूपों को जहाँ तहाँ छिपाने का प्रयास भी किया था। 
गो. कमलनैंन जी ने मुस्लिम उत्पात के कारण 1669-1670 में वृन्दावन को छोड़कर अपना निवास स्थल कामवन (कामा) को बना लिया था। चाचा वृन्दावनदास जी कृत 'हित रूप चरित्र बेली' में वर्णित गो. हित रूपलाल जी के चरित्र से ज्ञात होता है कि 1690 में गो. कमलनैंन जी कामवनस्थ श्रीराधावल्लभ मन्दिर में विद्यमान थे। वर्णित वृत्त इस प्रकार है -
1681 में आर्विभूत गो. रूपलाल जी जब नौ वर्ष के हुए तब श्रीराधाबल्लभलाल जी के दर्शन हेतु अजानगढ़ (कामवन) गये। दर्शन करते ही उनके मन में यह अभिलाषा हुई कि हम भी मन्दिर के भीतर जाकर निकट से दर्शन करें। बहुत चेष्टा करने पर भी मर्यादानुसार उन्हें निज मन्दिर के भीतर नहीं जाने दिया गया। तब वे कुछ खाये पीये बिना भूखे ही सो गये। रात्रि में श्रीराधाबल्लभलाल जी ने गो. श्रीकमलनैंन जी से स्वप्न में कहा कि बालक हितरूप भूखा ही सो गया है इसलिये हमने भी भोजन नहीं किया है -
श्रीकमलनैंन कौं सुपन यह, प्रभु राधाबल्लभ जब दियौ।
भूखौ जु विमन हितरूप पुनि, ता बिनु हम भोजन न कियौ॥
 
प्रातःकाल होते ही सेवाधिकारी गो. कमलनैंन जी ने बालक हितरूप के पितृचरण गो. हरिलाल जी को बुलाकर स्वप्न की सारी बातें सुनाई और कहा कि तुम्हे ज्ञात है कि निज मन्दिर में प्रवेश पाने के लिये परमेष्ट स्वामिनी श्रीराधा द्वारा प्रकटित नाद मंत्र की दीक्षा प्राप्त करना नितान्त अनिवार्य है। अतः तुम इसी समय बालक हितरूप को दीक्षित करो। दीक्षित कराने के पश्चात् गो. कमलनैंन जी ने हितरूप को मन्दिर में प्रवेश कराया और हितरूप ने श्रीराचाबल्लभलाल जी के चरण स्पर्श करके अपनी आन्तरिक अभिलाषा पूर्ण की -
 
प्रात जगनि उठि लगनि भई, श्रीकमलनैंन मन।
श्रीहरिलाल बुलाइ, कही गाथा जु रूप पन॥
सुचि रुचि प्रथम कराइ, आपु कर धरि अपनायौ।
कृपा सहित उर लाइ, तात पै मंत्र दिवायौ॥
तब बोलि माँहिं मन्दिर लये, प्रभु-चरन लागि भये प्रेम-बस।
भनि वृन्दावन हित रूप बलि, यह प्रगट प्रीति पाछिली अस॥
 
गो. ब्रजलाल जी को सेवाधिकार सौंपना :
अतिबल्लभदास जी, जयकृष्णदास जी और चाचा वृन्दावनदास जी आदि सम्प्रदाय के सभी इतिहास विद् इस तथ्य में एक मत हैं कि गो. कमलनैंन जी के कोई पुत्र नहीं था। अतः इन्होंने अपने लघु भ्राता गो. बिहारीलाल जी के द्वितीय पुत्र गो. ब्रजलाल जी को दत्तक पुत्र समझकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था -
 
श्रीप्रभु कमलनैंन निजु आसन। श्रीब्रजलाल बैठे परकाशन॥
विचले विदित बिहारीलाल। तिनके सुत सब परम कृपाल॥
मोहनलाल रु श्रीब्रजलालहिं। उर धरि चतुरलाल गुन-मालहिं॥
 
संवत सत्रह सै चवन, कार्तिक तेरस सेत।
श्रीब्रजलाल कृपाल हित-आसन पर सुख देत॥
 
शिष्य :
गो. कमलनैंन जी के ऐसे सर्वमनोहारी रसिक रूप और रसद्रावी मधुर वाणी से आकृष्ट होकर अनेकानेक जीव इनके शरणापन्न हुए। गोस्वामी जी ने भी अपनी समुदारता से उन सभी को रस भक्ति रूपी धन देकर रसिक बना दिया। इस तथ्य का संकेत करते हुए चाचा वृन्दावनदास जी ने लिखा है कि -
 
दियौ कृपा करि भक्ति-वितु, भृत्य किये समरथ्थ। 
भजन- उजागर ते भये, जिन सिर धर्यौ जु हत्थ॥
 
चरन सरन जे अनुसरे, ते सब भये प्रवीन जन।
 
सम्प्रदाय के इतिहास ग्रन्थों का अन्वेषण करने पर इनके अनेक शिष्यों के नाम ज्ञात होते हैं जिनमें से कतिपय नाम उल्लेखनीय है 1. सहचरिसुख (सखीसुख या सुखसखी) 2. वैनी कवि 3. गोस्वामी ब्रजलाल 4. अतिबल्लभदास या बल्लभदास 5. बल्लभ सखी 6. हितअनूपअलि 7. वंशीधर वरसानियाँ 8. जन जयकृष्ण 9. ऊधौदास 10. जोरीदास 11. चरणदास पुजारी 
 
रचना :
गो. कमलनैंन जी के कृपापात्र अतिबल्लभदास जी की वाणी से गो. कमलनैंन जी द्वारा विरचित 'समय प्रबन्ध' किंवा 'अष्टयाम सेवा समय प्रबन्ध' नामक ग्रन्थ का पता चलता है।
 
श्रीमत् रास-विलास जु लह्यौ। प्रभु श्रीकमलनैंन सो चह्यौ॥
चाहि कह्यौ पुनि निजु वानी करि। पद रचना विचित्र नाना धरि॥
ताकौ नाम सु समय प्रबन्ध। पद रचना भाषामय ग्रन्थ॥
सेवा समय सात हैं तिहिं मधि। उत्सव रितु सेवा नाना विधि॥
 
समय प्रबन्ध के छन्दों में स्थल-स्थल पर गो. श्रीहितकमलनैंन जी की छाप वाले पदों के साथ-साथ गो. कमलनैंन जी का गुरु रूप में सादर स्मरण, उनकी जन्म तिथि, उनकी वाणी की महत्ता, वाणी में वर्णित पदों एवं कतिपय पदों की तुकों का उल्लेख और अतिबल्लभ नाम की छाप का दर्शन भी मिलता है।
 
इन अष्टयामी पदों के अतिरिक्त बसन्त, होली, होलीडोल, फूलडोल, चन्दन रचना, फूल-रचना, मलार और झूलन आदि ऋतुत्सवों की सेवा के पद भी प्राप्त हुए हैं।
गो. कमलनैंन जी के पदों की कतिपय प्राचीन प्रतियों में प्राप्त पंक्तियों से यह भी ज्ञात होता है कि इन्होंने जलविहारोत्सव, शरद रासोत्सव और कार्तिक सुदी प्रतिपदा को होने वाले वनविहारोत्सव के पदों की रचना की थी। कुछ पद ऐसे भी हैं जिनमें नन्दनन्दन-वृषभानुनन्दिनी की जन्म बधाइयों का गान तथा ब्रज क्षेत्रीय होली, गिरि गोवर्धन विहार और संकेतवट विहार, आदि का गान करके वाणी प्रणेता को तत्-तत् लीला उपासकों का भी मनस्तोष करना पड़ा है। 'स्फुट पदावली' में श्रीहित-वंशावली श्रीगुरु-वंदन और जीवोपदेश सम्बन्धी फुटकर रचनायें हैं।
 
श्रीकिशोरीशरण 'अलि' जी महाराज ने 'साहित्य रत्नावली" नामक खोज विवरण में गो. कमलनैंन जी की निम्नांकित रचनायें बतलाई हैं।
1. अष्टयाम (समय प्रबन्ध) 2. पद्यावली 3. वर्षोत्सव।
 
लीला संवरण :
गो. कमलनैंन जी के निकुंज गमन होने की इदमित्थं तिथि का उल्लेख हमें इन्हीं के वंशज निकुंज निवासी गो. श्रीललिताचरण जी महाराज (बड़वाला मुहल्ला वृन्दावन) के यहाँ सुरक्षित प्राचीन हस्तलिपि में लिखित एक जीर्ण शीर्ण पत्र में देखने को मिला। जिसमें सम्प्रदाय के मूलाचार्य गो. श्रीहित हरिवंश जी और उनके पश्चात् होने वाले उनके अन्यान्य सेवाधिकारियों की जन्म तिथि, सेवाधिकार प्राप्ति की तिथि एवं निकुंज गमन की तिथियाँ उल्लिखित हैं। इसमें गो. कमलनैंन जी का निकुंज गमन काल अगहन शुक्ला एकादशी 1696 लिखा मिलता है।