श्री वृंदावन रेनु को मरम न पावै कोय - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (192)

श्री वृंदावन रेनु को मरम न पावै कोय - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (192)

श्री वृंदावन रेनु को, मरम न पावै कोय ।
मिलैं रसिक युग चंद्रमा, दृढ़ कर खोजे जोय ॥

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (192)

श्री वृन्दावन की रज का वास्तविक मर्म कोई नहीं जान सकता, क्योंकि यहाँ की रज की ऐसी महिमा है कि इस रज में यदि कोई साधक दृढ़ता के साथ श्री राधा-कृष्ण की खोज करता है, तो उसे अवश्य ही रसिक युगल-चन्द्र श्री राधा-कृष्ण की प्राप्ति होती है।