किं कार्यं वत राधे - श्री वृषभानुपुर शतक (89), श्री वंशी अली द्वारा रचित

किं कार्यं वत राधे - श्री वृषभानुपुर शतक (89), श्री वंशी अली द्वारा रचित

किं कार्यं वत राधे त्वमेव वद त्वत्स्वरूपसक्ताय  ।
देयं किं मे नाप्तिं मन्यायाप्तावपि ह्यस्मै ॥

- श्री वृषभानुपुर शतक (89), श्री वंशी अली द्वारा रचित

[श्री राधा के प्रति ललिता जी का प्रेम]
ललिता कह रही हैं – हे श्रीराधे ! अब आप ही बतायें, वह नीलमणि श्रीकृष्ण आपकी रूप- माधुरी पर अतिशय आसक्त हैं, मैं उनके लिये क्या कर सकती हूँ, मेरी कौन-सी ऐसी वस्तु है, जिसे मैं उनको नहीं दे सकती अर्थात् मेरी प्रत्येक वस्तु उनके लिये न्यौछावर है ।