गुणातीतं महद्धाम पूर्णप्रेमस्वरूपकम् वृक्षादिपुलकैर्यत्र प्रेमानंदाश्रुवर्षितम् । (68)
किं पुनश्चेतनायुक्तैर्विष्णुभक्तैः किमुच्यते गोविंदांघ्रिरजः स्पर्शान्नित्यं वृंदावनं भुवि ।। (69)
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद (68, 69)
यह पवित्र धाम गुणातीत है, एवं पूर्ण प्रेम स्वरूप है जहां वृक्ष इत्यादि भी भाव विभोर होकर [पुलक इत्यादि युक्त] आँसु बहाते हैं, फिर पूर्ण चेतना युक्त विष्णु भक्त जो यहाँ निवास करते हैं उनके बारे में क्या ही कहा जाए । इस धरती पर श्री वृंदावन ही वह भूमि है जो नित्य ही भगवान कृष्ण के चरणों की रज के संपर्क में रहती है।
किं पुनश्चेतनायुक्तैर्विष्णुभक्तैः किमुच्यते गोविंदांघ्रिरजः स्पर्शान्नित्यं वृंदावनं भुवि ।। (69)
- पद्मपुराण, खण्डः 5 (पातालखण्डः), अध्याय 69, छंद (68, 69)
यह पवित्र धाम गुणातीत है, एवं पूर्ण प्रेम स्वरूप है जहां वृक्ष इत्यादि भी भाव विभोर होकर [पुलक इत्यादि युक्त] आँसु बहाते हैं, फिर पूर्ण चेतना युक्त विष्णु भक्त जो यहाँ निवास करते हैं उनके बारे में क्या ही कहा जाए । इस धरती पर श्री वृंदावन ही वह भूमि है जो नित्य ही भगवान कृष्ण के चरणों की रज के संपर्क में रहती है।

