जो करुनामय कुंवर अहु - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (47)

जो करुनामय कुंवर अहु - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (47)

(दोहा)
जो करुनामय कुंवर अहु, करुना मो पर है जु ।
तौ तुव पद नख चंद्र छबि, टरि न रहै उर ते जु ॥

(पद)
सहजहि रहौ एह सुभाव ।
प्रिया पद नख चन्द्रकी छबि टरि न उर ते जाव ।। [1]
जो पै करुना करति हो तो और चित्त न चाव ।
श्रीहरिप्रिया की उरझनी सों रहौ उर उरझाव ।। [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (47)

(दोहा)
हे करुणामयी कुँवरि लड़ैतीजू [श्रीराधे]! यदि आपकी मुझ पर लेशमात्र भी कृपा है, तो मैं यही वरदान माँगता हूँ कि आपके चरणारविन्दों के नख-चन्द्र की दिव्य छटा मेरे हृदय से कभी ओझल न हो।

(पद)
मेरा सहज ही यह भाव बना रहे कि आपके चरणारविन्द के नख चन्द्र की छटा मेरे हृदय से कभी भी टारी न टरे। [1]

जो आपकी मुझ पर कृपा है तो इससे अतिरिक्त मेरी और कोई अभिलाषा नहीं है, कि मेरा हृदय श्रीहरि की प्रिया अर्थात स्वामिनी के प्रेम की उलझन में सदा उलझा रहे । [2]