कोटि कोटि सुकदेव से, कोटि कोटि जयदेव - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (56)

कोटि कोटि सुकदेव से, कोटि कोटि जयदेव - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (56)

कोटि कोटि सुकदेव से, कोटि कोटि जयदेव ।
नित नव गुण वर्णन करैं, तऊ नहिं पावहिं भेव ॥

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (56)

करोड़ों श्री शुकदेव जी और करोड़ों श्री जयदेव जी जैसे महापुरुष भी यदि नित्य नवीन श्री धाम वृन्दावन के गुणों का वर्णन करें, तो भी वे उनके रहस्य (भेद) को पूर्णतः नहीं पा सकते।