(राग धनाश्री)
आजु गोपाल रास रस खेलत,
पुलिन कलपतरु तीर री सजनी ।
सरद विमल नभ चंद विराजत,
रोचक त्रिविध समीर री सजनी ।। [1]
चंपक बकुल मालती मुकुलित,
मत्त मुदित पिक कीर री सजनी ।
देसी सुधंग राग रँग नीकौ,
ब्रज जुवतिनु की भीर री सजनी ।। [2]
मघवा मुदित निसान बजायौ,
व्रत छाँड़यौ मुनि धीर री सजनी ।
(जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा,
हरति मदन घन पीर री सजनी ।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (24)
( श्रीहित सजनी ने कहा – )
अरी सजनी ! आज विमल कल्पवृक्ष के तीर यमुना पुलिन पर श्रीगोपाल लाल रास क्रीड़ा कर रहे हैं । सजनी ! जैसा निर्मल शरद का समय है वैसा ही सुन्दर चन्द्रमा आकाश में शोभित है और रोचक त्रिविध ( शीतल मन्द सुगन्धित ) पवन भी बह रहा है । [1]
अरी सखी ! देख तो चम्पा , मौलिश्री और मालती कैसी सुन्दर फूली हैं एवं कोयल भी कैसी मुदित और प्रेम मतवाली हो रही है ! अरी वीर ! देसी और सुधंग ( नृत्य ) का राग रँग कितना भला है और ब्रज युवतियों की अपार भीड़ भी ( कितनी भली ) है ! [2]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं – सजनी ! इन्द्र ने प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजायी है और [ रास रस से विह्वल होकर ] परमधीर मुनियों ने भी अपना [ मौन ध्यान आदि ] व्रत छोड़ रखा है । [ वे रसमग्न हुए रास नृत्य का दर्शन कर रहे हैं ] प्यारी सखी ! आज श्यामा ( श्रीराधा ) मग्न मन हैं रास में और मदन ( प्रेम ) की घनीभूत पीड़ा का हरण कर रही हैं । [3]
आजु गोपाल रास रस खेलत,
पुलिन कलपतरु तीर री सजनी ।
सरद विमल नभ चंद विराजत,
रोचक त्रिविध समीर री सजनी ।। [1]
चंपक बकुल मालती मुकुलित,
मत्त मुदित पिक कीर री सजनी ।
देसी सुधंग राग रँग नीकौ,
ब्रज जुवतिनु की भीर री सजनी ।। [2]
मघवा मुदित निसान बजायौ,
व्रत छाँड़यौ मुनि धीर री सजनी ।
(जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा,
हरति मदन घन पीर री सजनी ।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (24)
( श्रीहित सजनी ने कहा – )
अरी सजनी ! आज विमल कल्पवृक्ष के तीर यमुना पुलिन पर श्रीगोपाल लाल रास क्रीड़ा कर रहे हैं । सजनी ! जैसा निर्मल शरद का समय है वैसा ही सुन्दर चन्द्रमा आकाश में शोभित है और रोचक त्रिविध ( शीतल मन्द सुगन्धित ) पवन भी बह रहा है । [1]
अरी सखी ! देख तो चम्पा , मौलिश्री और मालती कैसी सुन्दर फूली हैं एवं कोयल भी कैसी मुदित और प्रेम मतवाली हो रही है ! अरी वीर ! देसी और सुधंग ( नृत्य ) का राग रँग कितना भला है और ब्रज युवतियों की अपार भीड़ भी ( कितनी भली ) है ! [2]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं – सजनी ! इन्द्र ने प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजायी है और [ रास रस से विह्वल होकर ] परमधीर मुनियों ने भी अपना [ मौन ध्यान आदि ] व्रत छोड़ रखा है । [ वे रसमग्न हुए रास नृत्य का दर्शन कर रहे हैं ] प्यारी सखी ! आज श्यामा ( श्रीराधा ) मग्न मन हैं रास में और मदन ( प्रेम ) की घनीभूत पीड़ा का हरण कर रही हैं । [3]

