जुगलचरन हिय ना धरै, मिलै न संतनि दौरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (111)

जुगलचरन हिय ना धरै, मिलै न संतनि दौरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (111)

जुगलचरन हिय ना धरै, मिलै न संतनि दौरि ।
व्यासदास ते जगत में, परे पराई पौरि ॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (111)

जो हृदय में श्री युगल (श्री राधा-कृष्ण) के चरणों को धारण नहीं करता और संतों के पास दौड़कर (श्रद्धापूर्वक) नहीं जाता, श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को इस संसार के मायाजाल में फँसकर, दूसरों के द्वार पर ही भटकना पड़ता है।