जन्म :
श्री वनचन्द्र गोस्वामी जी श्री हित हरिवंश महाप्रभु के ज्येष्ठ पुत्र थे। इनका जन्म चैत्र कृष्ण छठ 1528 में देववन में हुआ था।
बाल्यकाल एवं शिक्षा :
श्री वनचन्द्र जी बाल्यकाल से ही श्री राधारानी के अनुरागी थे। ब्रजभाषा मातृ भाषा होने से ये ब्रज भाषा के विद्वान् तो थे ही साथ में इन्होने संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की एवं संस्कृत के उच्चकोटि के विद्वान् हुए।
श्री नवरंगीलाल जी की सेवा :
श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने अपने बाल्यकाल में श्री नवरंगीलाल जी को एक कुँए से प्रकट किया था। जब महाप्रभु देववन से वृन्दावन आ गए तब श्री वनचन्द्र जी देववन में ही रहे और श्री नवरंगीलाल जी की सेवा करने लगे।
गृहस्थ जीवन :
श्री वनचन्द्र जी के चार पुत्र थे, सब से बडे श्री सुन्दरवर जी, इनका जन्म संवत् 1609 आशिन सुदी पूर्णिमा। दूसरे श्री राधा वल्लभदास जी, इनका जन्म सम्वत् 1610 कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा। तीसरे नागरवर जी, इनका जन्म संवत् 1611 कार्तिक सुदी पूर्णिमा। चौथे श्री ब्रजभूषण जी का सं० 1612 में प्राकट्य हुआ।
वृन्दावन आगमन :
कुछ दिन देववन में रहने के पश्चात् श्री वनचन्द्र जी महाप्रभु के दर्शन के लिए व्याकुल हो गए एवं अपने तीनों भ्राताओं संग वृन्दावन आ गए। वृन्दावन में श्री राधावल्लभ जी का दर्शन कर परम आनंदित हुए एवं चरणों में प्रणाम किया। फिर महाप्रभु के चरणों में प्रणाम किया। महाप्रभु ने श्री वनचन्द्र जी को श्री राधावल्लभ जी की सेवा प्रणाली समझा कर सेवा प्रदान कर दी। अब श्री वनचन्द्र जी श्री राधावल्लभ जी की सेवा में मग्न रहने लगे।
संप्रदाय की गादी पर विराजमान होना :
श्री वनचन्द्र जी को श्री राधावल्लभ जी की सेवा प्रदान कर महाप्रभु 1552 की शरद पूर्णिमा को देह सहित अंतर्ध्यान हो गए। तब सब महानुभावों ने मिलकर श्री वनचंद्र जी को श्री हिताचार्य जी की गादी पर कार्तिक सुदी 13 चंद्रवार को विराजमान किया और उसी दिन श्री राधावल्लभ जी का पाटोत्सव था। इनके गादी पर विराजने के उपलक्ष में समाज वैष्णव आराधन हुआ और सब वैष्णव व ब्रजवासियों को भोजन कराया गया। गादी पर बैठने से ही इनका नाम वनमालीदास जी हुआ। पहले इनका नाम श्री वनचंद्र महाप्रभु जी था।
श्री राधावल्लभ मंदिर का निर्माण करवाना :
महाप्रभु के जीवनकाल में मुसलमान शासक हिन्दुओं के देवस्थानों का निर्माण नहीं होने देते थे। श्री वनचन्द्र प्रभु द्वारा राधावल्लभ-संप्रदाय की बागडोर सँभालने के कुछ दिन बाद दिल्ली में बादशाह अकबर का धर्मसहिष्णु शासन आरंभ हो गया था और उसने अपने हिन्दू सामन्तों को देवस्थान बनवाने की आज्ञा दे दी थी।
श्री वृन्दावन में उस समय श्रीराधावल्लभ सम्प्रदाय की आचार्य पीठ पर श्री हिताचार्य के ज्येष्ठ पुत्र श्री वनचन्द्र गोस्वामी विराजमान थे। उनके भक्तिभाव की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। श्री राधावल्लभजी उस समय एक छोटे मन्दिर में विराजमान थे। यह देखकर अकबर के एक मनसबदार गोपालसिंह जादौ ने श्री वनचन्द्र गोस्वामी से मिलकर उनके सामने श्री ठाकुरजी के लिए एक नवीन विशाल मन्दिर निर्माण करने का प्रस्ताव रखा। श्री वनचन्द्र गोस्वामी ने कहा कि मन्दिर निर्माण का प्रस्ताव तो हमको स्वीकार है, किन्तु हमारे यहाँ की एक बात अटपटी है और वह यह है कि नवीन मन्दिर में श्री ठाकुरजी जिस दिन विराजमान होंगे उसके ठीक एक वर्ष बाद मन्दिर का निर्माता देह त्याग कर श्री ठाकुरजी की शरण को प्राप्त हो जायेगा। गोपालसिंह यह बात सुनकर डर गये और दण्डवत करके उठकर चले गये।
इसके बाद अकबर के प्रसिद्ध सेनानायक महाराजा मानसिंह श्री वनचन्द्र गोस्वामी से मिले। गोस्वामी पाद ने वही शर्त उनके सामने भी रखी। उससे भयभीत होकर वे श्री चैतन्य सम्प्रदाय के श्री रूप गोस्वामी पाद के पास चले गये और उनकी अनुमति से श्री गोविन्दजी का प्रसिद्ध मन्दिर बनवा दिया। मन्दिर निर्माण का प्रस्ताव लेकर अन्य कई लोग श्री वनचन्द्र गोस्वामी से मिले, किन्तु मृत्युभय के सामने कोई नहीं ठहर पाया।
श्री वनचन्द्र गोस्वामी का एक शिष्य दिल्ली में रहता था। अनेक दिनों से उसकी इच्छा गुरुदेव को अपने घर दिल्ली पधराने की थी और अनेक बार वह इनके पास अपनी प्रार्थना पहुँचा चुका था। उसकी प्रीति देखकर गोस्वामीजी उसके घर पधारे और मनोरथ को पूर्ण किया। सुन्दरदासजी ने जब यह सुना कि उनके गुरुदेव के ज्येष्ठ भ्राता दिल्ली पधारे हैं तो उन्होंने भी उनको अपने घर पधराया और उनकी सेवा में एक लाख रुपया अर्पित किया। साथ ही उनसे प्रार्थना की कि "आप इस द्रव्य से प्रभु के भोग-राग को अच्छी तरह चलाइए और श्री वृन्दावन से बाहर कहीं मत जाइए। आप वहाँ रहकर जीवों का जितना उपकार कर सकेंगे उतना बाहर पधारने से नहीं होगा। आप मेरी इस प्रार्थना को मान लीजिए। आप प्रभु की सेवा के लिए मुझे जब आज्ञा दिया करेंगे तब मैं धन भेज दिया करूँगा।" श्री वनचन्द्र गोस्वामी को सुन्दरदास की यह बात बहुत बुरी लगी और उनको क्रोध आ गया। वे उससे बोले "अरे मति मन्द मूढ़, परम प्रभु भी भक्तों के अधीन रहकर उनकी प्रीति का पोषण करते रहते हैं। भक्त जब व्याकुलतापूर्वक उनको टेरता है तो श्री हरि सब कुछ छोड़कर उसके पास दौड़ जाते हैं। जो प्रभु का स्वभाव है वही उनके भक्तों का होता है। ये लोग भी संसार में जीवों का उपकार करते हुए विचरण करते रहते हैं। जिस प्रकार सूर्य चारों दिशाओं में घूमकर संसार के भय और अन्धकार को नष्ट करता रहता है उसी प्रकार ये संत भी सर्वत्र विचरण करते हुए जगत् के अज्ञानान्धकार को दूर करते रहते हैं। ये लोग परतन्त्र नहीं होते और प्रभु इच्छा से प्रेरित होकर ही यह कार्य करते हैं।"
यह कहकर श्री वनचन्द्र गोस्वामी वृन्दावन की ओर चल पड़े और उसकी भेंट को स्वीकार नहीं किया। सुन्दरदासजी को अपनी धृष्टता पर बहुत पश्चाताप हुआ। वे सोचने लगे कि मैंने महत् अपराध किया है, जो गुरु को उपदेश देने की चेष्टा की है। उन्होंने उसी समय यह निश्चय कर लिया कि जब तक गुसाईंजी प्रसन्न नहीं होंगे मैं भोजन नहीं करूंगा और केवल थोड़ा-सा दूध लेकर राज्यकार्य करता रहूँगा। इस प्रकार अनेक दिन व्यतीत होने पर उक्त घटना की सूचना इनके गुरु को देववन में मिली। श्री गोपीनाथजी दिल्ली पधारे और सुन्दरदासजी को अपने साथ लेकर अपने अग्रज श्री वनचन्द्र गोस्वामी से मिले। वनचन्द्र सुन्दरदासजी से अत्यन्त प्रेमपूर्वक मिले, किन्तु उनकी भेंट स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए। सुन्दरदासजी ने निवेदन किया कि मैं तो यह धन आपको भेंट कर चुका हूँ। आप यदि आज्ञा दें तो इसे प्रभु के मन्दिर निर्माण में लगा दूँ। गोस्वामी पाद ने वही बात सुन्दरदासजी से कह दी जो उन्होंने गोपालसिंह जादौ और राजा मानसिंह से कही थी। सुन्दरदासजी ने इस शर्त को सुनकर अपने भाग्य का पूर्ण उदय माना और प्रार्थना की कि जो रज ब्रह्मादिक को दुर्लभ है वह आप मुझको अपनी ओर से प्रदान कर रहे हैं। मुझे आपकी शर्त सहर्ष स्वीकार है। मेरी एक ही प्रार्थना है कि शरीर छूटने के बाद मेरी समाधि नवनिर्मित मन्दिर के सामने बनायी जाय। गोस्वामीजी ने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। मन्दिर का निर्माण कार्य तीन वर्ष में पूरा हो गया।
सुन्दरदासजी ने इस पर मुक्तहस्त से धन खर्च किया। इससे उनके विरोधियों को अवसर मिल गया और उन्होंने खानखाना से चुगली लगाई कि दीवानजी आपके खजाने को खाली किये दे रहे हैं। रहीम खानखाना अपनी उदारता के लिए इतिहास में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने सुन्दरदासजी को बुलाकर कहा कि वृन्दावन में तुम जो मन्दिर बनवा रहे हो उसमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिए अन्यथा मेरी बदनामी होगी। तुमको जितने रुपयों की जरूरत हो खजाने से लेते रहो। सुन्दरदासजी और अधिक उत्साह के साथ श्री ठाकुरजी की सेवा में प्रवृत्त हो गये। इन्होंने अनेक बहुमूल्य पटभूषण बनवाये और कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी 1584 को बहुत धूमधाम के साथ श्री राधावल्लभलाल को नये मन्दिर में विराजमान कर दिया।
वह एक वर्ष तक श्री ठाकुरजी के सब उत्सव पूर्ण उत्साह और विपुलव्यय के साथ करते रहे। जब वही कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी का दिन आया तो उन्होंने अपने गुरु, परिवार और श्री वृन्दावन के संत महन्तों को एकत्रित करके उनको भेंट चढ़ाई तथा उनका चरणोदक लिया। इसके बाद इन्होंने उन लोगों से प्रार्थना की कि 'हित चौरासी' का 'बनी वृषभानुनन्दिनी आज' पद गाने की कृपा करें। सब लोगों ने मिलकर पद गाया। पद की अंतिम पंक्ति पूरी होते ही श्री सुन्दरदासजी देह त्याग कर अपने इष्ट के चरणों में लीन हो गये।
महाप्रभु के शिष्य श्री सेवक जी (दामोदरदास जी) से भेंट :
श्री वनचन्द्र जी की इच्छा सेवक जी से मिलने की विशेष थी ओर आप कहते भी थे कि “जो मैं सेवक जी को देखूं तो सब भंडार लुटा दूं।” कई दिन के पश्चात् श्री सेवक जी वृन्दावन आये। उस समय आप सेवा में थे, नित्य प्रति श्री राधा वल्लभ लाल की दृष्टि आप पर ही रहती थी। परन्तु आज इन पर नहीं यह देख आप बड़े विचार मग्न हुए कि ऐसा क्या अपराध हुआ कि श्री राधावल्लभ लाल की दृष्टि मुझ पर से हट गई। हो न हो कहीं सेवक जी तो नहीं आये क्योंकि वही ऐसे हैं जो श्री राधावल्लभ लाल को मुझ से अधिक प्रिय हैं। एसा विचार कर आपने बाहरकी तरफ देखा तो श्री सेवक जी खड़े हैं, उनको देख आप बाहर आये और आलिङ्गन कर मिले। फिर आपने आज्ञादी कि सब भंडार ब्रजवासी व साधुओं को लुटा दिया जाय। यह सुन श्रीसेवक जी ने प्रार्थना की कि सब भंडार न लुटाया जाय केवल प्रसादी भंडारही लुटा दिया जाय क्योंकि अमनिया विना भोग लगे बाहर नहीं जाना चाहिये। श्री सेवक जी की वाणी सुन आपने यही आज्ञा दे दी और भंडार लुटवा दिया। सेवकजी ने बहुत दिन श्री वन में निवास किया और निज कृत वाणी भेंट की। वाणी देखकर श्री वनचन्द्र जी ने आज्ञा दी कि यह वाणी श्री चतुरासी जी के साथ में रहेगी क्योंकि ये दोनों मनुष्यों को भव जाल से उद्धार करने वाली हैं।
वृन्दावन में निर्माण कार्य :
श्री राधावल्लभ-मन्दिर के अतिरिक्त गोस्वामी वनचन्द्रजी ने श्री हित महाप्रभु द्वारा स्थापित रासमंडल पर 1592 में एक अन्य मंदिर का भी निर्माण कराया तथा श्री राधावल्लभजी के मन्दिर और सेवाकुंज के मध्य में एक डोल (हिंडोला) का निर्माण कराकर वहाँ 'नाम-सेवा' पधराई और उसके सामने रासमण्डल की रचना की। इस स्थान पर अनेक वर्षों से संध्या समय नित्यप्रति विभिन्न मंडलियों द्वारा रासलीला की जाती है। वृन्दावन में यही एक स्थान ऐसा है जहाँ नित्यप्रति रासलीला होती है।
रचना :
श्री वनचन्द्र गोस्वामी की संस्कृत में तीन रचनायें प्राप्त हैं - 'श्री राधा अष्टोत्तरशतनामानि', 'श्री हरिवंशाष्टक' तथा 'श्री प्रियानामावली’। उत्सवों से सम्बद्ध इनके कुछ पद ब्रजभाषा में मिलते हैं। उनकी रचना इन्होंने वनमालीदास के नाम से की है। पदों की भाषा संस्कृतगर्भित और प्रौढ़ है।
श्री वनचन्द्र जी ने "श्रीहित दंपति विलास" नामक ग्रन्थ की रचना की थी। उस ग्रन्थ को देख कर सबों ने कहा कि यह तो श्रीहित प्रभुकी वाणी से भी सुन्दर है, यह सुनकर श्री वनचन्द्र जी ने वह श्री यमुना जी में पधरा दिया। फिर आपने फुटकर पद भेंट किये। उदाहरण के लिए -
हमारे बल श्री राधा नाम।
काहू के बल भजन भावना, जप व्रत तीरथ धाम।
परम मंत्र श्री हित जू दीनों, ताहि जपों सब याम॥
विधि निषेधमग छोड़ लह्यो हम अनन्य धर्म अभिराम।
जै श्री बनमाली मिल्यो वास वनराज नहीं मोक्षसों काम॥
"श्री वनचंद्र जी कहते हैं "किसी का बल भजन भावना है तो किसी का बल जप है, किसी का व्रत है तो किसी का तीर्थाटन, लेकिन मेरा बल तो केवल श्री राधा नाम है। श्री हित जू ने मुझे परम मन्त्र प्रदान किया है और मैं हर समय उसीका जप करता हूँ।"
मैंने विधि निषेध का मार्ग छोड़ कर रसिकों का अनन्य धर्म अपना लिया है, मुझे अब श्री वृन्दावन का वास प्राप्त हो गया है जिसके समक्ष मोक्ष भी हेय है।"
मैंने विधि निषेध का मार्ग छोड़ कर रसिकों का अनन्य धर्म अपना लिया है, मुझे अब श्री वृन्दावन का वास प्राप्त हो गया है जिसके समक्ष मोक्ष भी हेय है।"
शिष्य :
श्री वनचन्द्र जी के मुख्य शिष्यों के नाम चतुर्भुजदास जी, भुवनदास जी, नागरीदास जी, झूंठा स्वामी जी, भागमती जी, कल्याण पुजारी जी, माधौ मुकुन्द जी, सुरध्वज, माधौ रसिक जू, जयदेव जी, कल्याणी बाई, भगवानदास जी, सोमनाथ भट्ट, वैष्णवदास जी। इनमें से सब गृहस्थ थे केवल झूंठा स्वामी जी एवं चतुर्भुजदास जी ने ही वैराग्य लिया था।
लीला संवरण :
श्री वनचन्द्र जी ने अपने चारों पुत्रों को सेवा बांट श्री चरणों में लीन हुए। श्री सुन्दरवर जी को सन्ध्या शयन दी, श्री राधा वल्लभ दास जी को शृंगार आरती व श्री नागरवर जी को राज भोग आरती तथा श्री ब्रज भूषण दास जी को मंगला आरती दी। इस प्रकार आपने चारों पुत्रों को सेवा बांट कर श्री वनचन्द्र जी 1608 अगहन शुक्ल 11 को निकुंज प्रवेश कर गए।

