काम क्रोध दंभनि भरयौ, बंध्यौ विषय की डोर ।
ऐसे क़ौं तुम सरन बिन, नाहिंन दूजौ ठौर ॥
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (9)
हे श्री राधा महारानी जू! मेरा मन काम, क्रोध, दंभ और विषयासक्ति से भरा हुआ है, और मैं विषयों की डोर में बँधा पड़ा हूँ। ऐसे मुझ अधम और पापी के लिए आप जैसे करुणासिंधु की शरण के अतिरिक्त कोई दूसरा आश्रय नहीं है।
ऐसे क़ौं तुम सरन बिन, नाहिंन दूजौ ठौर ॥
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (9)
हे श्री राधा महारानी जू! मेरा मन काम, क्रोध, दंभ और विषयासक्ति से भरा हुआ है, और मैं विषयों की डोर में बँधा पड़ा हूँ। ऐसे मुझ अधम और पापी के लिए आप जैसे करुणासिंधु की शरण के अतिरिक्त कोई दूसरा आश्रय नहीं है।

