जाप जप्यो नहिं मन्त्र थप्यो - ब्रज के सेवैया

जाप जप्यो नहिं मन्त्र थप्यो - ब्रज के सेवैया

(सवैया)
जाप जप्यो नहिं मन्त्र थप्यो, नहिं वेद पुरान सुने न बखानौ। [1]
बीत गए दिन यों ही सबै, रस मोहन मोहनी के न बिकानौ॥ [2]
चेरों कहावत तेरो सदा पुनि, और न कोऊ मैं दूसरो जानौ। [3]
कै तो गरीब को लेहु निबाह, कै छाँड़ो गरीब निवाज कौ बानौ॥ [4]

- ब्रज के सेवैया

न मैंने भगवन्नाम का जप किया, न किसी मंत्र का अनुष्ठान किया। न वेद-पुराणों का श्रवण किया, न किसी कथा का कथन किया। [1]

हे श्री श्यामा-श्याम, मैंने तो बस आपके चरणों की शरण ली है; फिर भी, इतना समय बीत जाने पर भी आपके प्रेमरस में डूब नहीं पाया हूँ। [2]

मैं सदा आपका ही दास कहाता हूँ, आपके अतिरिक्त किसी और का स्मरण नहीं करता। [3]

हे श्री श्यामा-श्याम, या तो मुझ दीन की बांह पकड़कर इस माया से पार लगाइए, अन्यथा ‘गरीब निवाज’ कहलाने का अभिमान छोड़ दीजिए। [4]