दरसन मिलवो बोलिवो रसिक जननि सों होय - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (12)

दरसन मिलवो बोलिवो रसिक जननि सों होय - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (12)

दरसन मिलवो बोलिवो, रसिक जननि सों होय ।
दुर्लभ जो नहिं पाइये, छिन में पावे सोय ॥

- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (12)
 
यदि वृन्दावन के रसिकजनों का संग मिल जाए—उनका ददर्शन, मिलना एवं बोलना हो जाए—तो साधक दुर्लभ से दुर्लभ रस-फल भी एक क्षण में प्राप्त कर सकता है।