मथुरां च परित्यज्य - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.211)

मथुरां च परित्यज्य - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.211)

मथुरां च परित्यज्य यो’न्यत्र कुरुते रतिम् ।
मूढो भ्रमति संसारे मोहिता मम मायया ।।

- श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.211)

जो मूर्ख व्यक्ति मथुरा [ब्रज मंडल] को त्यागकर किसी अन्य स्थान से मोहित हो जाता है मानो वह मेरी माया से मोहित होकर जन्म-जन्मान्तर इसी संसार में भटकता रहता है।