(सवैया)
‘हरे कृष्ण’ सदा कहते-कहते, मन चाहे जहाँ वहाँ घूमा करूँ। [1]
मधु मोहन रूप का पी करके, उसमें उनमत्त हो झूमा करूँ॥ [2]
अति सुन्दर वेश ब्रजेश तेरा, रमा रोम-ही-रोम में रूमा करूँ। [3]
मन-मन्दिर में बिठला के तुझे, पग तेरे निरन्तर चूमा करूँ॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
मैं सदा “हरे कृष्ण” का जाप करूँ और जहाँ मन चाहे, उस श्यामसुन्दर के रस में मग्न होकर घूमता फिरूँ। [1]
मनमोहन के रूप का पान कर, उन्मत्त होकर आनंद की मस्ती में झूमता रहूँ। [2]
हे ब्रजेश, तेरा रूप अत्यंत मनोहर है; अपने रोम-रोम में तुझे बसाकर, हर श्वास में तेरा ही भजन करता रहूँ। [3]
हे मोहन, तुझे अपने मन-मंदिर में बिठाकर, तेरे चरणों को नित्य प्रेमपूर्वक चूमा करूँ । [4]
‘हरे कृष्ण’ सदा कहते-कहते, मन चाहे जहाँ वहाँ घूमा करूँ। [1]
मधु मोहन रूप का पी करके, उसमें उनमत्त हो झूमा करूँ॥ [2]
अति सुन्दर वेश ब्रजेश तेरा, रमा रोम-ही-रोम में रूमा करूँ। [3]
मन-मन्दिर में बिठला के तुझे, पग तेरे निरन्तर चूमा करूँ॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
मैं सदा “हरे कृष्ण” का जाप करूँ और जहाँ मन चाहे, उस श्यामसुन्दर के रस में मग्न होकर घूमता फिरूँ। [1]
मनमोहन के रूप का पान कर, उन्मत्त होकर आनंद की मस्ती में झूमता रहूँ। [2]
हे ब्रजेश, तेरा रूप अत्यंत मनोहर है; अपने रोम-रोम में तुझे बसाकर, हर श्वास में तेरा ही भजन करता रहूँ। [3]
हे मोहन, तुझे अपने मन-मंदिर में बिठाकर, तेरे चरणों को नित्य प्रेमपूर्वक चूमा करूँ । [4]

