अहह जन्म सहस्र समेधितै र्बहु तपोजप योग समाधिभिः।
असुलभ लभतेऽप्यधि राशिकावनमये नमयेदपि यः शिर ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (15.25)
अहह! हजारों जन्म अनेक तप, जप, योग एवं समाधि आदि साधनों से जिसकी प्राप्ति नहीं होती, वही प्रेम पुरुषार्थ इस श्रीराधिका वन को केवल एक बार शिर झुका कर प्रेम से प्रणाम करने से ही प्राप्त हो जाता है।
असुलभ लभतेऽप्यधि राशिकावनमये नमयेदपि यः शिर ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (15.25)
अहह! हजारों जन्म अनेक तप, जप, योग एवं समाधि आदि साधनों से जिसकी प्राप्ति नहीं होती, वही प्रेम पुरुषार्थ इस श्रीराधिका वन को केवल एक बार शिर झुका कर प्रेम से प्रणाम करने से ही प्राप्त हो जाता है।

