साधो भाई ऐसौ महल हमारौ ।
निर्गुण सगुण वारि है जाकी कहत न वेद विचारौ ।। [1]
अद्भुत प्रेम रंग रस अद्भुत अद्भुत नित्य बिहारौ ।
ललित प्रिये सुख रासि रसिकवर करि राख्यौ उरहारौ ।। [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (101)
हे साधु भाई, हमारी श्री राधा का निज महल ऐसा अद्भुत है जिसपर समस्त सगुण उपासना एवं निर्गुण उपासना को वारा जा सकता है, जिसे वेद भी कहने में असमर्थ हैं । [1]
इस महल में अद्भुत प्रेम, अद्भुत रंग, एवं अद्भुत नित्य विहार का रस बरसता है । समस्त सुख की राशि, प्रियतम श्री लाल जी के लिए श्री प्रिया जी के महल का यह रस ही उनके हृदय में समाया हुआ है । [2]
निर्गुण सगुण वारि है जाकी कहत न वेद विचारौ ।। [1]
अद्भुत प्रेम रंग रस अद्भुत अद्भुत नित्य बिहारौ ।
ललित प्रिये सुख रासि रसिकवर करि राख्यौ उरहारौ ।। [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (101)
हे साधु भाई, हमारी श्री राधा का निज महल ऐसा अद्भुत है जिसपर समस्त सगुण उपासना एवं निर्गुण उपासना को वारा जा सकता है, जिसे वेद भी कहने में असमर्थ हैं । [1]
इस महल में अद्भुत प्रेम, अद्भुत रंग, एवं अद्भुत नित्य विहार का रस बरसता है । समस्त सुख की राशि, प्रियतम श्री लाल जी के लिए श्री प्रिया जी के महल का यह रस ही उनके हृदय में समाया हुआ है । [2]

