गौर स्याम मंजुल मृदुल, अद्भुत की कांति  - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (7)

गौर स्याम मंजुल मृदुल, अद्भुत की कांति - श्री भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (7)

गौर स्याम मंजुल मृदुल, अद्भुत की कांति ।
अधर सुधारस बारुनि, पियत लहैं सुख सांति ॥

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (7)

गौर-श्याम स्वरूप वाले प्रिया-प्रियतम के श्रीअंगों की कांति अत्यंत सुन्दर, कोमल और अद्भुत है। यह दिव्य जोड़ी परस्पर अधरामृत-रस का पान करते हुए सतत सुख और शांति का अनुभव करती है। उसी रस से उनका तोषण और पोषण होता रहता है।