हमारे ब्रज की रानी राधे - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (74)

हमारे ब्रज की रानी राधे - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (74)

हमारे ब्रज की रानी राधे ।
जिन निज बस करि मोहन सह सब ब्रज-नर-नारी नाधे ।। [1]
परम उदार धाइ सुमिरन के पहिलेहि नासत बाघे ।
कहि 'हरिचंद' सोच उनकी मोहि जे नहिं इनहि अराधे ।। [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (74)

हमारे ब्रज की रानी श्री राधे महारानी हैं जिनके वश में सबको वश में करने वाले श्री स्याम सुंदर मोहन लाल हैं एवं समस्त ब्रज के नर और नारी इनकी भक्ति करते हैं । [1]

हमारी ऐसी परम उदार स्वामिनी हैं जिनका सुमिरन करने के संकल्प से पूर्व ही समस्त बाधाओं का नाश हो जाता है । श्री भारतेंदु हरिशचंद्र कहते हैं कि मैं उन जीवों के बारे में विचार करता हूँ [अर्थात् वो तो बेचारे अभागे हैं] जो ऐसी परम उदार स्वामिनी श्री राधा महारानी की भक्ति नहीं करते । [2]