एक बार छबि देखी तिनकौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (457)

एक बार छबि देखी तिनकौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (457)

(सवैया)
एक बार छबि देखी तिनकौं, त्रिभुवन तृण सा लागे है। [1]
इस दर का जु भिखारी उससे, सब जग भिक्षा माँगे है॥ [2]
जो ह्याँ का फिर सो न अनत का, दंपति पानिप पागे है। [3]
'हित भोरी' मतवारा बेसुध, सोता सा जग जागे है॥ [4]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (457)

जिसे एक बार प्रेम-रस का धाम वृन्दावन और वहाँ की रसमयी सम्पन्नता को देखने का परम सौभाग्य मिल जाता है, उसे फिर तीनों लोकों की संपत्ति तुच्छ लगने लगती है, मानो वह तिनके के समान हो। [1]

जो श्री वृन्दावनेश्वरी, स्वामिनी श्रीराधा के द्वार का भिखारी है, उससे तो समस्त संसार भिक्षा मांगता है। [2]

जिस पर एक बार वृन्दावन का रंग चढ़ जाता है, वह सभी जगह से मुँह मोड़कर हित दम्पति श्री श्यामा-श्याम के प्रेम रूप-रस में ही मग्न हो जाता है। [3]

श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं, “ऐसा प्रेमी तो श्री लाडिली-लाल के प्रेम में इतना मतवाला हो जाता है कि अपनी सुध-बुध तक भूल जाता है; जबकि संसार उसे सोया हुआ समझता है ।”[4]