परिचय :
ताज बीबी श्री कृष्ण की परम भक्त थीं। इनका जन्म 17वीं शताब्दी में हुआ था। ताज बीबी के पिता का नाम पद्न खान था। ताज बीबी का विवाह बादशाह अकबर के साथ हुआ था।
आध्यात्मिक जीवन :
अकबर के मंत्री बीरबल की बेटी शोभावती और जैमल की बेटी लीलावती की गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के चरणों में अनन्य निष्ठा थी और वे दोनों श्री कृष्ण की भक्त थीं। दोनों गोवर्धन में श्रीनाथजी के दर्शनों के लिए आया करती थीं। लीलावती और शोभावती ताज बीबी के पास आती थीं जिससे ताज बीबी को सत्संग और श्री कृष्ण चरित्र श्रवण का अवसर मिलता था जिससे ताज बीबी के ह्रदय में श्री कृष्ण के प्रति श्रद्धा प्रकट हो गयी।
बीरबल की बेटी शोभावती जब ताज बीबी से मिलने आती तो अक्सर वृन्दावन और गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी की चर्चा किया करती थी। शोभावती ने ताज बीबी को ब्रज धाम और गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी की इतनी महिमा बताई की ताज बीबी को ब्रज धाम और गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के दर्शनों की लालसा होने लगी।
प्रथम वृन्दावन आगमन :
बादशाह अकबर के ह्रदय में गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के प्रति अगाध श्रद्धा थी और वे गुसाईं जी के दर्शनों के लिए समय-समय पर गोवर्धन आया करते थे। एक बार ताज बीबी अकबर से अनुमति लेकर गुसाईं जी के दर्शन करने गोवर्धन आयीं। गुसाईं जी के दर्शन कर ताज बीबी कुछ समय के लिए गोवर्धन में ही रुक गयीं और गुसाईं जी के सत्संग में भाग लेने लगी। ताज बीबी ने ब्रज में अनेक लीला स्थलियों एवं मंदिरों के दर्शन किये। ब्रज धाम के लता कुंजों का दर्शन कर ताज बीबी का मन ब्रज से बाहर जाने को नहीं हुआ लेकिन फिर भी अकबर के आदेशानुसार कुछ दिन बाद दिल्ली लौट आयी।
ताज बीबी ब्रज से लौट तो आयी लेकिन उनका मन ब्रज में ही रमण कर रहा था। वह मुख से श्री कृष्ण नाम का जप करने लगी।
अखंड वृन्दावन वास के लिए प्रयत्न करना :
ताज बीबी ब्रज से श्री कृष्ण का एक चित्र अपने साथ लायी थी जिसको पुष्प एवं फल अर्पण कर उसकी सेवा करने लगी। अब ताज बीबी श्री कृष्ण के रूप में आसक्त होने लगी और विचार करने लगी की "कैसे ब्रज धाम का अखंड वास प्राप्त हो ? यदि बादशाह अकबर से इसकी अनुमति माँगूँ तो वे जाने नहीं देंगे।" ऐसा विचार कर एक समय ताज बीबी गुसाईं जी के दर्शन करने गोवर्धन आयी। गुसाईं जी के दर्शन कर ताज बीबी ने गुसाईं जी से कहा "महाराज, ऐसी कृपा कीजिये की मेरे पति मेरी अभिलाषा को पूर्ण करें।"
गुसाईं जी ने कहा "अपने पति के प्रत्येक आदेश का पालन करो, तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।"
इसके बाद ताज बीबी दिल्ली लौट आयी और अकबर के प्रत्येक आदेश कर पालन करने लगी। एक दिन अकबर ने विचार किया की ताज बीबी मेरी हर आज्ञा का पालन करती है, मुझे भी उसकी इच्छा पूर्ण करनी चाहिए। ऐसा विचार कर अकबर ने ताज बीबी से पूछा "तुम्हारी क्या इच्छा है"
ताज बीबी ने विचार किया की यदि मैं ब्रजवास मांगू तो अकबर मना कर देंगे, इसलिए ताज बीबी ने कहा "महाराज, मुझे आगरा के महल में निवास करना है, मुझे आगरा भेज दीजिये।" अकबर इस बात के लिए मान गया और ताज बीबी को यमुना के रास्ते नाँव से आगरा भेज दिया। आगरा ब्रज की सीमा पर स्थित है। इसलिए ताज बीबी अब अक्सर गोवर्धन, गोकुल, वृन्दावन, बरसाना आदि स्थानों के दर्शन के लिए आने लगी।
ताज बीबी का वृन्दावन के लिए प्रेम :
ताज बीबी गुसाईं जी का सत्संग भी सुनने के लिए आया करती थी। वह सत्संग में जिस लीला का श्रवण करती उसी के चिंतन में डूबी रहती। अब ताज बीबी का ह्रदय श्री कृष्ण विरह में जलने लगा और वह श्री कृष्ण के दर्शन के लिए रोती रहती। ताज बीबी की वेश भूषा भी बदल गयी थी।
एक दिन बादशाह अकबर आगरा आया। आगरा में अकबर की दूसरी पत्नियों ने अकबर से ताज बीबी की शिकायत की कि "ताज बीबी बिलकुल बदल चुकी है, उसकी वेश भूषा भी बदल गयी है। कलमा-कुरान छोड़कर श्री कृष्ण का चित्र ह्रदय से लगाए रोती रहती है। सदैव कृष्ण-कृष्ण जपती रहती है। उसका खान-पान भी बदल गया है। आप ताज बीबी का ध्यान दीजिये वारना कल को बदनामी होगी।"
बादशाह अकबर ने जब रानियों से ताज बीबी का विवरण सुना तो वे इतने प्रभावित हुए की ह्रदय से बहुत प्रसन्न हुए। अकबर ने ताज बीबी को कुछ नहीं कहा और किसी चीज़ के लिए रोका नहीं।
ताज बीबी की दासी ने ताज बीबी को बताया की "आपके विरोध में समस्त रानियां अकबर से आपकी शिकायत कर रही हैं।"
ताज बीबी ने किसी को कुछ नहीं कहा और अपने इष्ट श्री कृष्ण से प्रार्थना करने लगी -
सुनो दिल जानी मेरे दिल की कहानी तुम,
हुस्न की बिकानी बदनामी भी सहूँगी मैं।
देव पूजा ठानी हौं निवाज हूँ भुलानी तजे,
कलमा कुरान सारे गुनन गहूँगी मैं॥
श्यामला सलोना सिरताज सिर कुल्ले दिये,
तेरे नेह दाग में निदाग ह्वै दहूँगी मैं।
नन्द के कुमार कुरवान ताणी सूरत पै,
हौं तो मुगलानी हिन्दुआनी ह्वै रहूँगी मैं॥
अखंड वृन्दावन वास और श्री गोविंददेव जी के साक्षात् दर्शन :
ताज बीबी अब हर समय श्री कृष्ण से ब्रजवास के लिए प्रार्थना करने लगी। महल में न कोई सत्संग था, न कीर्तन, इसलिए ताज बीबी दुखी रहने लगी। उसे ब्रज के मंदिर और संतों की याद आने लगी। ताज बीबी का खाना भी कम हो गया जिससे उसका शरीर कमज़ोर होने लगा। एक दासी ने ताज बीबी की इस अवस्था के बारे में अकबर को बताया। अकबर ताज बीबी के पास आया और उससे पूछने लगा "तुम बहोत दिनों से दुखी रहती हो और रोती रहती हो, तुम्हें किस बात का दुःख है ?"
ताज बीबी ने कहा "मुझे वृन्दावन वास करना है, जहाँ नित्य सत्संग प्राप्त होगा और संतो के दर्शन होंगे।"
अकबर ने कहा "तुम्हारे ह्रदय में श्री कृष्ण भक्ति है, जो बड़े भाग्य से किसी-किसी को ही प्राप्त होती है, तुम चिंता मत करो, मैं वृन्दावन में तुम्हारे रहने की व्यवस्था करा दूंगा, तुम जाओ और वृन्दावन वास करो।"
ताज बीबी वृन्दावन आ गयी और एक कुटिया में रहने लगी। उस समय वृन्दावन में श्री गोविंददेव जी का मंदिर प्रसिद्ध था। ताज बीबी को श्री गोविंददेव जी के दर्शन करने की इच्छा थी लेकिन अपने को म्लेच्छ मानकर वह मंदिर के भीतर नहीं जाती थी। यद्यपि ताज बीबी को मंदिर में आने पर रोक नहीं थी। ताज बीबी नित्य श्री गोविंददेव मंदिर के द्वार पर चौखट पर प्रणाम कर लौट जाती थी। लेकिन ताज बीबी के ह्रदय में श्री गोविंददेव जी के दर्शन की इच्छा थी। वह यही विचार करती की "मैं इस म्लेच्छ शरीर से मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं कर सकती, श्री गोविंददेव जी के दर्शन नहीं कर सकती। लेकिन ठाकुर जी तो अंतर्यामी हैं, मेरे ह्रदय की बात जानते हैं, जब वे किसी पुजारी के ह्रदय में प्रेरणा द्वारा मुझे मंदिर के भीतर बुलाएँगे तो मैं उनके दर्शन का सुख प्राप्त कर पाऊँगी।" ऐसा विचार कर वह प्रतिदिन मंदिर के द्वार पर आती, चौखट पर प्रणाम करती और अपने कुटिया में लौट आती। ऐसा करते बहुत दिन बीत गए, लेकिन किसी भी पुजारी ने उसे मंदिर के भीतर नहीं बुलाया।
एक दिन ताज बीबी गोविंददेव मंदिर आयी और चौखट पर प्रणाम कर कुछ प्रणय कोप से श्री गोविंददेव जी से कहने लगी "आप तो दया के सागर हैं, फिर मुझसे ऐसी निष्ठुरता क्यों ? क्या मैं आपके दर्शन भी नहीं कर सकती ! तो मैं अब आपके मंदिर कभी नहीं आउंगी और जब तक आप स्वयं आकर दर्शन नहीं देंगे तब तक अन्न जल भी ग्रहण नहीं करुँगी।" ठाकुर जी से ऐसा कह कर ताज बीबी अपने कुटिया पर लौट आयी। 3 दिन बीत गए ताज बीबी को अन्न जल ग्रहण किये। शरीर कमज़ोर हो गया लेकिन वह श्री कृष्ण का स्मरण कर रोती रही। मध्य रात्रि में ताज बीबी को असह्य पीड़ा होने लगी। उसी समय उसने एक गंभीर वाणी सुनी "ताज, देखो मैं तुम्हारे लिए भोजन और जल लाया हूँ।"
ताज बीबी ने देखा तो नीला प्रकाश फ़ैल रहा है और उसमे नीलमणि श्री गोविंददेव जी भोजन और जल लिए खड़े हैं। श्री गोविंददेव जी के दर्शन करते ही ताज बीबी को मूर्छा आ गयी। श्री गोविंददेव जी भोजन और जल को वहीँ रख कर अंतर्ध्यान हो गए। जब ताज बीबी की मूर्छा गयी तो वह सोचने लगी की यह कोई स्वप्न था या सत्य। पुरे कुटिया में एक दिव्य सुगंध व्याप्त थी। जब ताज बीबी ने भूमि पर देखा तो वही भोजन की थाल और जल की झारी रखी थी जो ठाकुर जी के हाथों में थी। ताज बीबी समझ गयी की ठाकुर जी सत्य में आये थे। ताज बीबी ने सोचा की मेरे प्रण के कारण ही ठाकुर जी को रात्रि में यहाँ आने का कष्ट करना पड़ा। ताज बीबी को बहुत पश्चाताप हुआ। अपने को धैर्य देते हुए ताज बीबी ने ठाकुर जी का प्रसाद ग्रहण किया। प्रसाद का ऐसा स्वाद ताज बीबी ने जीवन में कभी अनुभव नहीं किया था। उसका शरीर रोमांचित होने लगा और ह्रदय एक नविन उत्साह से भर गया। ताज बीबी को लीलाओं की स्फूर्ति होने लगी। उन लीलाओं को ताज बीबी पद्य में लिपिबद्ध कर लेती। श्री कृष्ण दर्शन का पद इस प्रकार है -
छैल जो छबीला, सब रंग में रंगीला
बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूं देवतों से न्यारा है।
माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जो है कान,
कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिर धारा है॥
दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज,
चित्त में निहारे प्रन, प्रीति करन वारा है।
नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,
वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है॥
अगले दिन सुबह श्री गोविंददेव जी के मंदिर में पुजारीगण ठाकुरजी के भोग की थाल और जल की झारी खोजने लगे लेकिन वह किसी को भी नहीं मिली। मंदिर के पुजारीगण आश्चर्यचकित थे की मंदिर तो बंद था तो भोग की थाल और जल की झारी कैसे गायब हो सकती है। यहाँ कुटिया में ताज बीबी ने भोग की थाल और जल की झारी को मांज कर दासी के हाथों से मंदिर भिजवा दिया। दासी भोग की थाल और जल की झारी लेकर मंदिर पहुंची तो मंदिर के पुजारी स्तब्ध हो गए। उन्होंने दासी से पूछा की "तुमको भोग की थाल और जल की झारी कैसे मिली"
दासी ने कहा "महारानी ताज बीबी ने यह भिजवाया है।"
पुजारीगण ताज बीबी के पास आये और ताज बीबी से पूछने लगे "भोग की थाल और जल की झारी आपके पास कैसे आयी।"
ताज बीबी ने सब वृतांत सुना दिया। पुजारीगण ताज बीबी के भाग्य की सराहना करने लगे। यह बात धीरे-धीरे पुरे ब्रज मंडल में फ़ैल गयी। दूर-दूर से लोग ताज बीबी के दर्शनों के लिए आने लगे जिससे ताज बीबी को भजन में विक्षेप होने लगा। कुछ दिन बाद ताज बीबी यमुना पार कर गोकुल महावन चली गयीं और अपने जीवन का शेष समय वहीँ व्यतीत किया।
रचना :
ताज बीबी ने अनेक पदों की रचना की है जिसमें विनय, रूप माधुरी, ऐश्वर्य, प्रेम, आदि के पद सम्मिलित हैं। उदहारण के लिए -
अल्ला बिसमिल्ला रहिमान और रहीम छोड़,
पीर और शहीदों की चर्चा न चलाऊँगी।
सूथना उतार पहिन घांघरा घुमावदार,
फरिया को फार शीश चूनरी चढ़ाऊँगी॥
कहत शहजादी ठाकुर कवी सों पैज कर,
वृन्दावन छोड़ अब कितहूँ न जाऊँगी।
बांदी बनूँगी राधा-महारानी जू की,
तुर्किनी बहाय नाम गोपिका कहाऊँगी॥
लीला संवरण :
ताज बीबी ने गोकुल महावन में ही देह त्याग कर गोपी स्वरुप से श्री राधा कृष्ण की लीलाओं में सम्मिलित हो गयी। यहीं पर ताज बीबी की समाधी है।

