कब कौ टेरतु दीन ह्वै होत न स्याम सहाइ - बिहारी लाल, बिहारी सतसई (696)

कब कौ टेरतु दीन ह्वै होत न स्याम सहाइ - बिहारी लाल, बिहारी सतसई (696)

कब कौ टेरतु दीन ह्वै, होत न स्याम सहाइ।
तमहूँ लागी जगतगुरु, जगनाइक जग-बाइ ॥

- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (696)

हे श्याम, मैं कब से दीन होकर तुम्हें पुकार रहा हूँ, किन्तु तुम सहाय (प्रसन्न) नहीं होते। हे जगत-गुरु, जगन्नायक! क्या आपको भी इस संसार की हवा लग गई है?