गिरि कीजै गोधन, मयूर कुंजन को मोहिं - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (101)

गिरि कीजै गोधन, मयूर कुंजन को मोहिं - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (101)

(कवित्त)
गिरि कीजै गोधन, मयूर कुंजन को मोहिं,
पसु कीजै महाराज नन्द के बगर कौ। [1]
नर कौन? तौन, जौन ‘राधे-राधे' नाम रटै,
तट कीजै वर कूल कालिंदी कगर कौ॥ [2]
इतने पै जोई कछु कीजिए कुँवर कान्ह,
राखिए न आन फेर ‘हठी’ के झगर कौ। [3]
गोपी-पद-पंकज-राग कीजै महाराज!
तृन कीजै रावरेई गोकुलनगर कौ॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (101)

हे श्री कृष्ण, यदि आप मुझे शिला बनाना चाहें तो गोवर्धन की शिला बनाना, मयूर बनाना हो तो आपके कुञ्ज का मयूर बनाना, और यदि पशु बनाना तो महाराज नन्द के महल का ही कोई पशु बनाना। [1]

यदि मुझे मनुष्य का जन्म देना तो ऐसा मनुष्य बनाना जो नित्य "राधे-राधे" का रटन लगाए, और यदि तट बनाना हो तो मुझे यमुना जी का ही तट बनाना। [2]

हे श्री कृष्ण, आप मुझे चाहे जो कुछ भी बना दें, लेकिन अपने चरण कमलों से दूर न करें। [3]

मेरी एकमात्र अभिलाषा यह है कि मुझे गोपियों के चरणों की रज प्राप्त हो, इसलिए मुझे गोकुल धाम का एक तृण बना देना जिससे मैं सदा उनके चरणों में ही रहूँ। [4]