परिचय :
रामदास वछ वन वसत, लसत हिये हित नाम।
कृष्णचंद्र प्रभु कृपाते, निरखत श्यामा श्याम॥
श्री रामदास जी वछवन ग्राम के निवासी थे जो कि ब्रज चौरासी कोस में इस नाम से विख्यात है। इनका जीवन काल 17th शताब्दी अनुमानित किया गया है।
आध्यात्मिक जीवन :
श्री रामदास जी पहले रामानन्दी वैष्णव थे। किसी समय इनको एक अनन्य धर्मी राधावल्लभीय संप्रदाय के वैष्णव मिले और कुछ काल उनके संग सतसंग भी हुआ। जिसके बाद श्री रामदास जी उनका रहन सहन व भगवत भक्ति में अटल निष्ठा देख बहुत ही प्रसन्न हुए और उनसे इस मार्ग के अवलोकनार्थ बहुत सी बातें पूछीं। उन्होंने भी इनको सदुपदेश द्वारा सांत्वना देते हुए इस मार्ग के प्रवर्त्तक का सुयश सुनाया। यह सुनकर श्री रामदास जी उन्हीं के साथ श्री वृन्दावन आये और श्री राधावल्लभ जी के दर्शन कर आनन्दित हो श्री हित हरिवंश महाप्रभु के चतुर्थ पुत्र श्री कृष्णचंद्र महाप्रभु जी के शिष्य हुए। गुरु उपदेश द्वारा इनके अन्तः करण की दृष्टि खुल गई और अनुराग में लव लीन हो गए।
एक समय ये ब्रज परिक्रमा देते हुए किसी ग्राम में पहुंचे, वहां इनको एक मुसलमान अफसर ने बहुत तंग किया। तब श्री रामदास जी ने वहां कुछ चमत्कार दिखाकर उसे वशीभूत किया। वहां से श्री रामदास जी श्री वृन्दावन पधारे और भवसागर से उद्धार होने के लिये श्री प्रिया प्रियतम की उपासना करने लगे। कुछ समय बाद इनको प्रथम श्री आचार्य महाप्रभु जी के दर्शन हुए एवं कुछ काल उपरांत श्री श्यामाश्याम के दर्शन हुए।
रचना :
श्री रामदास जी ने दो ग्रंथों की रचना की, भक्त सुयश एवं सेवक यश।
लीला संवरण :
श्री रामदास जी ने वृन्दावन में ही देह त्याग किया और निकुंज को प्राप्त होकर दंपति केलि रसका आस्वादन किया।

