श्री राधे बरसाने वारी, नँदनंदन सुखघन बनवारी॥
जब चह रास करन बनवारी, मुकुट उतारि धरत पग प्यारी।
सब जग वारी लखि बनवारी, बनवारी वारी लखि प्यारी॥ [1]
सब जग आत्मा है बनवारी, बनवारी हूँ आत्मा प्यारी।
प्राण हमारो है बनवारी, प्राण प्राण है भानुदुलारी॥ [2]
श्रुति कह रसस्वरूप बनवारी, रसिक बनाय दीन तिन प्यारी।
तबहि 'कृपालु' भये बनवारी, जबहिं कृपा किय भानुदुलारी॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (85)
बरसाने वाली श्री राधा की जय, सुखघन नंदनंदन बनवारी की जय। जब श्री कृष्ण को महारास करने की इच्छा हुई, तब उन्होंने अपना मुकुट उतार कर श्री राधा के चरणों में रखकर रास की याचना की, क्यूंकि महारास की अधिष्ठात्री देवी श्री राधा ही हैं। समस्त जगत श्री कृष्ण को देखकर स्वयं को न्योंछावर कर उनकी बलैया लेते हैं और श्री कृष्ण श्री राधा को देखकर स्वयं को न्योंछावर कर उनकी बलैया लेते हैं। [1]
समस्त जगत के आत्मा श्री कृष्ण ही हैं, वे सब जगह नित्य विराजमान हैं, लेकिन श्री कृष्ण की आत्मा श्री राधा हैं। श्री कृष्ण हमारे प्राण हैं, लेकिन श्री कृष्ण की प्राण श्री राधा हैं। [2]
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "जिन्हें वेद रस स्वरूप कहते हैं वो श्री राधा के समक्ष दीन रहकर रस की याचना करते हैं। श्री कृष्ण तभी कृपालु हुए जब श्री राधारानी ने उनपर कृपा की।" [3]
जब चह रास करन बनवारी, मुकुट उतारि धरत पग प्यारी।
सब जग वारी लखि बनवारी, बनवारी वारी लखि प्यारी॥ [1]
सब जग आत्मा है बनवारी, बनवारी हूँ आत्मा प्यारी।
प्राण हमारो है बनवारी, प्राण प्राण है भानुदुलारी॥ [2]
श्रुति कह रसस्वरूप बनवारी, रसिक बनाय दीन तिन प्यारी।
तबहि 'कृपालु' भये बनवारी, जबहिं कृपा किय भानुदुलारी॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी 3 (85)
बरसाने वाली श्री राधा की जय, सुखघन नंदनंदन बनवारी की जय। जब श्री कृष्ण को महारास करने की इच्छा हुई, तब उन्होंने अपना मुकुट उतार कर श्री राधा के चरणों में रखकर रास की याचना की, क्यूंकि महारास की अधिष्ठात्री देवी श्री राधा ही हैं। समस्त जगत श्री कृष्ण को देखकर स्वयं को न्योंछावर कर उनकी बलैया लेते हैं और श्री कृष्ण श्री राधा को देखकर स्वयं को न्योंछावर कर उनकी बलैया लेते हैं। [1]
समस्त जगत के आत्मा श्री कृष्ण ही हैं, वे सब जगह नित्य विराजमान हैं, लेकिन श्री कृष्ण की आत्मा श्री राधा हैं। श्री कृष्ण हमारे प्राण हैं, लेकिन श्री कृष्ण की प्राण श्री राधा हैं। [2]
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "जिन्हें वेद रस स्वरूप कहते हैं वो श्री राधा के समक्ष दीन रहकर रस की याचना करते हैं। श्री कृष्ण तभी कृपालु हुए जब श्री राधारानी ने उनपर कृपा की।" [3]

