परिचय :
अनन्य रसिकाचार्य श्री स्वामी हरिदास जी की परंपरा में यों तो अनेकानेक समर्पित भक्त और साधक हो चुके, उन सब में श्री भगवतरसिक जी का अपना विशिष्ट महत्व और स्थान है। उनकी वाणी का अवगाहन करने पर पता चलता है कि उनके पारदर्शी व्यक्तिव्त में सखी संप्रदाय की रसोपासना सम्पूर्ण तेजस्विता लिए मूर्तिमान हो उठी है। साधना मार्ग के अनेक सोपानों पर चढते हुए उन्होंने ऊँचाई के उन शिखरों पर पहुँचकर अपना आसन जमा लिया था जहाँ तक किसी बिरले की ही पहुंच हो पाती है।
जन्म :
पं० श्रीमाधवदासजी एक अच्छे विद्वान और श्रेष्ठ कवि थे। महाराजा छत्रसाल के पुत्र हृदयशाह (हिरदेशाह) ने सं 1710 में गढ़ाकोटा को अपनी राजधानी घोषित किया था। उस समय कविरत्न पं० श्रीमाधवदासजी को 'पादारख' के रूप में उन्होंने कई बीघे जमीन दान में दी थी। वह भूमि 'पटेरियानाला' से लगी हुई है। पं० माधवदासजी के दो पुत्र थे। बड़े पुत्र का नाम रामदास और छोटे का नाम भगवतीप्रसाद था। भगवतीप्रसाद का जन्म सं 1733 की वैशाख शुक्ल 3 (अक्षयतृतीया) को मध्यान्ह को हुआ था।
गुरु के प्रथम दर्शन :
स्वामी ललितमोहनीदासजी सं 1749 में बुन्देलखण्ड का भ्रमण करते हुए गढ़ाकोटा पधारे थे। उनके त्याग-वैराग्य, भक्ति-ज्ञान की चर्चा सुनकर पं० माधवदासजी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अपने प्रिय पुत्र भगवतीप्रसाद को उनके चरणों में समर्पित कर दिया। भगवतीप्रसाद की आयु उस समय 16 वर्ष की थी। गुरुदेव स्वामी ललितमोहनीदास जी ने उनका क्या नाम रखा, यह तो विदित नहीं परन्तु उन्होंने अपनी रचनाओ में सर्वत्र "भगवतरसिक" नाम से अपने को अभिहित किया है, इसलिए आज सभी लोग उन्हें "भगवतरसिक" नाम से ही जानते-मानते हैं।
वृन्दावन दर्शन की व्याकुलता एवं प्रथम आगमन :
गुरु-कृपा से भगवतरसिक के हृदय में भक्ति के बीज अंकुरित होने लगे, सत्संग भजन में रुचि बढ़ गई और वृन्दावन-दर्शन की लालसा अन्तःकरण में हिलोरे लेने लगी। अतः सं 1755 में उन्होंने एक दिन अपने मित्र प्राणप्यारे के साथ वृन्दावन की डगर पकड ली। यहाँ उनके गुरु स्वामी ललितमोहनीदास जी के भी गुरु स्वामी ललितकिशोरीदास जी महाराज उस समय विराजमान थे। वे उन्ही की सन्निधि में रुक गए।
वृन्दावन में श्री ललित किशोरी देव जी की सन्निधि :
वृन्दावन के तत्कालीन सिद्ध रसिकों में स्वामी ललितकिशोरीदास जी का नाम अग्रगण्य था। स्वामी हरिदासजी की विशुद्ध रस-रीति के कौशल व्याख्याता के रूप में उनकी ख्याति सर्वोपरि थी। उनका त्याग, उनका वैराग्य प्रशंसनीय था और रहनी स्पृहणीय। उनका सान्निध्य हृदय में वैराग्य उत्पन्न कर देता, मन सहज ही शीतल-शान्त हो जाता। स्वामी हरिदासजी के विशुद्ध नित्यविहार को समझने के लिए उनका सत्संग निर्मल दर्पण था। भगवतरसिक जी भी उनके सत्संग से बहुत लाभान्वित हुए।
वृन्दावन से श्री केलिमाल जी के साथ घर लौटना :
भगवतरसिक जी जब लौटकर घर जाने लगे, पाथेय के रूप में श्री स्वामी हरिदासजी की वाणी "केलिमाल" साथ में ले ली -
भगवतरसिक प्रानप्यारे दोऊ मिलि वृन्दावन आये।
बानी स्वामी जू की लै पुनि छत्तरपुरहिं सिधाये॥
- वृन्दावनधामानुरागावली, भगवतरसिक चरित
घर से दूर छत्तरपुर के कुंजन में निवास करना :
परन्तु गढ़ाकोटा के इतिहास को देखने से लगता है कि जिस समय भगवतरसिक जी अपने घर लौटे वह काल वहाँ के लिए बड़ा भयंकर था। वहाँ के राजा पृथ्वीसिंह के पाँचों पुत्र युद्ध में मारे गए थे। पृथ्वीसिंह की भी मृत्यु हो चुकी थी और गढ़ाकोटा की गद्दी खाली पड़ी थी।
ऐसी विषम परिस्थिति में पन्ना के राजा, महाराजा हिन्दूपत (सं 1757-1776) ने यद्यपि वहाँ का शासन-सूत्र अपने हाथों में सम्भाल लिया था और प्रशासक के रूप में अपने भाई खेतसिंह की नियुक्ति कर दी थी, फिर भी ऐसा लगता है कि वहाँ का हाल सुनकर भगवतरसिक जी के मन में गढ़ाकोटा जाने की कोई उमंग शेष नहीं रह गई और वे वहाँ न जाकर छतरपुर ही रुक गए। छतरपुर में भी उनकी पैतृक सम्पत्ति एवं घर मकान थे। वृन्दावनधामानुरागावली का यह संकेत कि "पुनि छत्तरपुरहि सिधारे" भी हमारी इसी धारणा की पुष्टि करता है।
छतरपुर के समीप लगभग दो मील की दूरी पर हरिदासी सम्प्रदाय का एक अतीव रमणीय स्थान है। उसे "कुंजन" कहते हैं। कुंजन की स्थापना महाराजा छत्रसाल ने मन्दिर श्रीगोरेलालजी की परम्परा के महन्त श्री गोविन्ददास जी की प्रसन्नता के लिए की थी। सिंगारी नदी के तट पर बाग-बगीचों से हरा-भरा यह स्थान वस्तुतः बहुत सुन्दर है। इसे देखकर वृन्दावन की स्मृति हो जाती है। स्थापना के समय ही श्रीगोविन्ददासजी ने निधिवन की रज बिखेरकर इसे वृन्दावनीय भावना से ओत-प्रोत कर दिया था। अतः उनका "कुंजन" नाम बहुत सार्थक लगता है।
कहते हैं, छतरपुर के तत्कालीन महाराज हिन्दूपत ने भगवतरसिक जी को बहुमान देकर कुंजन स्थान में रहने के लिए राजी कर लिया था। फलतः कुछ दिन उन्होंने वहीं निवास किया। उनके भजन-साधन, त्याग, वैराग्य एवं सत्संग-सदुपदेश का आस-पास की जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा। आज भी लोग उसे भगवतरसिक जी की सिद्धस्थली के नाम से पुकारते हैं और वहाँ के लोगों के मनोरथ उनके नाम की आन से ही पूर्ण हो जाते हैं।
सब कुछ त्याग कर फिर से वृन्दावन आना :
"कुंजन" में भी भगवतरसिकजी का मन अधिक दिन नहीं रमा। वृन्दावन से दूरी उन्हें खलती थी। वस्तुतः स्वामी हरिदासजी के विशुद्ध नित्य विहार- रस की साधना-उपासना वृन्दावन से दूर रहकर सम्भव ही नहीं है। इसलिए राजा और जनता से प्राप्त सम्मान उन्हें अधिक दिन तक वहाँ अटका न सका। वे वृन्दावन के लिए तडप उठे और वि० सं० 1823 (सं 1766) में स्वामी ललितकिशोरीदास जी के निकुञ्ज-गमन के उपरान्त लाखों की अपनी पैतृक सम्पत्ति, राजा-महाराजाओं के मान-सम्मान एवं वहाँ की जनता से प्राप्त पद-प्रतिष्ठा को तिनके की भाँति त्यागकर वे "कुंजन" से वृन्दावन चले आये। वहाँ आकर गुरुदेव स्वामी ललितमोहिनीदासजी से फाल्गुन पूर्णिमा को विरक्त वेश लेकर साधना की गहराई में उतर गये।
वृन्दावनधामानुरागावलीकार श्रीगोपालकविराय का भी कहना है कि--
तामें तत्पर ह्वै निज सम्पत्ति लाखन की तजि दीनीं।
वृन्दावन में आय चाय करि पुनि मति कहूँ न कीनीं।।
लै बइराग मोहिनीदासहिं कौ तिन सरनौं लीनौं।
परम विरक्त भागवत बिचरत रहत भगति हिय भीनौं।।
(भगवतरसिक चरित)
वृन्दावन और राजपुर के मध्य एक बावड़ी है एवं स्वामी भगवतरसिक जी यहीं पर रहकर भजन-साधन करने लगे। उनके शान्त स्वभाव, त्याग-वैराग्य भजन भावना से प्रभावित होकर उनके छोटे गुरु भाई स्वामी चतुरदासजी भी यहीं चले आये थे।
स्वामी भगवतरसिक जी की रहनी, करनी, त्याग, वैराग्य एवं स्वरुप की एक झाँकी :
त्याग-वैराग्य से दीप्त और नित्यकिशोर युगल की रसमयी उपासना से निरन्तर समुल्लसित श्रीभगवतरसिक जी के व्यक्तित्व की झाँकी प्रस्तुत करते हुए श्रीविहारीबल्लभजी कहते हैं--
उनके भव्य ललाट पर सुन्दर तिलक सुशोभित रहता है और विशाल नेत्रों में मस्ती की लालिमा छाई रहती है। समस्त मुख मण्डल शोभा का घर है और उनकी बोलन अत्यन्त प्यारी है। कण्ठ देश में कण्ठी और अंगों में लगी रज बड़ी सुहावनी लगती है। नाभि कुछ उन्नत होने से उनके उदर की छवि अवर्णनीय है। हाथ में करुवा लेकर जब वे चलते हैं तो धरती भी अपना अहोभाग्य मानती है। ऐसा लगता है मानो वैराग्य ही शरीर धारण कर भगवतरसिक के रूप में धरा पर आ गया है। उनका तपोमय शरीर पर्याप्त ऊँचा है और भुजायें घुटनों तक लम्बी, जो सभी को अभयदान देती है। कटि में कोपीन और कन्धे पर रजभरी गुदड़ी बड़ी भली लगती है। उनके मन में वैराग्य इतना है कि चरणों में पादुका तक नहीं रखते, जीवों पर दया कर धरती पर देख-देखकर कदम रखते हैं। ऐसे रसिक अनन्य का ध्यान मन के समस्त पातकों को दूर कर देता है।
स्वामी भगवतरसिकजी की रहनी बड़ी विलक्षण थी। वृन्दावन के प्रायः सभी रसिक ऐसी रहनी से जीने की कामना करते हैं। उनकी रहनी का संकेत करते हुए श्रीबिहारीबल्लभजी कहते हैं कि वे श्यामा-कुंजविहारी का नाम निरन्तर जपते रहते हैं। प्रतिदिन यमुना स्नान करते हैं और जमुना जल ही पीते हैं। परम वैराग्य और निष्किञ्चनता के प्रतीक करुआ को सदा साथ में लिए रहते हैं। उनके अंग-अंग से उनकी हर क्रिया से श्यामा-श्याम का प्रेम अभिव्यंजित होता रहता है। वृन्दावनवासी किसी भी व्यक्ति से उनका कोई राग-द्वेष नहीं है। वे मधुकरवृत्ति से जीवन-यापन करते हैं। काम-क्रोध, लोभ-मोह आदि समस्त विकारों को उन्होंने जला डाला है। मन और इन्द्रियों को युक्तिपूर्वक वश में कर लिया है। उनकी आँखों में लाड़िलीलाल की रूप-माधुरी निरन्तर तैरा करती है। नित्यविहार के सर्वोपरि सुख को विलस-विलस कर वे सदा हुलसते रहते हैं।
अयोध्या से मोहनरसिक एवं सिद्धरसिक का वृन्दावन आना तथा भगवत रसिक जी से रास का ध्यान सीखना:
अपने समय में स्वामी भगवतरसिकजी वृन्दावनीय रसोपासना विशेषतः हरिदासी नित्यविहार के सर्वोत्कृष्ट मर्मज्ञ और प्रत्यक्षद्रष्टा तो थे ही, एक कुशल व्याख्याता भी थे। साधकों, उपासकों और जिज्ञासुओं का आना-जाना उनके पास सदा बना रहता था। एक अनुभवी सन्त होने के नाते साधकों की साधना में आई अड़चनों को वे भलीप्रकार समझ लेते थे और उनसे पार पाने का उपाय भी बता देते थे। अतः उनकी कीर्ति ब्रज - वृन्दावन में ही नहीं, अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट आदि रसोपासना-केन्द्रों में भी फैल गई थी। दूर-दूर तक के भक्त, रसिक, सन्त उपासना-पद्धति सीखने के लिए उनके पास आते रहते थे। रामभक्ति में रसिक सम्प्रदाय शीर्षक शोध-ग्रन्थ के लेखक डॉ० भगवतीप्रसाद सिंह ने उल्लेख किया है कि मोहनरसिक जैसे उच्चकोटि के सन्त और सिद्धरसिक ने अयोध्या से वृन्दावन जाकर वहाँ के अनुभवी सन्त स्वामी भगवतरसिकजी से रास का ध्यान सीखा था।
भगवतरसिक जी द्वारा मृत बालक को प्राणदान :
भगवतरसिक जी की ख्याति सुनकर एक वैश्य भक्त उनका शिष्य हो गया। हरिदासी रस-रीति के अनुरूप मनसा-वाचा-कर्मणा वह अनन्य धर्म का पालन करने लगा। परन्तु कुछ ही दिन बीते होंगे कि उसका एक मात्र पुत्र बीमार पड गया। उसकी हालत निरन्तर बिगड़ती गई। सात दिन हो गये, पानी-पीना तो दूर उसने आँखें तक नहीं खोलीं। मृतक-जैसा पड़ा था। पास-पड़ोस और कुटुम्ब के लोग कहने लगे- "भाई, उसके पिता ने हरिदासी अनन्यता का उपदेश लेकर देवी की पूजा-अर्चा छोड़ दी है। इसी कारण देवी नाराज हो गई हैं।"
वह वैश्य भक्त बहुत परेशान था। वह तय नहीं कर पा रहा था कि ऐसी परिस्थिति में क्या करे ? एक तरफ अनन्यता का व्रत और दूसरी ओर इकलौते बेटे का मोह। वह गम्भीर संकट में था। कानों-कान यह बात श्रीभगवतरसिकजी तक पहुंची। उनका मन दया से भर उठा। उन्होंने बच्चे को अपने पास मंगाया और दाहिने पैर के अंगूठे को धोकर चरणामृत उसके मुख में डाला। वह उठ बैठा और स्वस्थ हो गया।
विषधर सर्प का भगवतरसिक जी की शरण में आना एवं कंठी धारण करना :
एक दिन भजन-भावना में लीन स्वामी भगवतरसिकजी आसन पर विराजमान थे। उसी समय कोई काला साँप फुँफकारता हुआ उनके सामने आ धमका। फुँफकार के शोर से उनकी आँखे खुलीं और उसकी ओर देखने लगीं। उनका हृदय करुणा से भर उठा। सर्प योनि में जन्म लेने के कारणभूत उसके पूर्व जन्म के कर्मों को देखकर उनका मन पसीज गया और उस अधम जीव की विवशता पर उन्हें तरस आ गया।
इधर वह साँप उन्हें देख ठिठक गया। उसका सारा तमोगुण दूर हो गया। सिर झुकाकर वह वहीं ठहर गया। भगवतरसिकजी ने कृपा-दृष्टि से उसे निहारा। उसकी सारी विषमता जाती रही। सर्प के सिमटे फन और शान्त मुद्रा को देखकर उसे शरणापन्न जान उन्होंने अन्य लोगों को भी बुलाया और सबके सामने ही गले में कण्ठी बाँधकर उसे शिष्य बना लिया।
सर्प के गले में कण्ठी बाँधने की बात सुनकर वस्तुतः आश्चर्य तो होता है, परन्तु सदा उनके साथ रहने वाले बिहारीबल्लभजी ने जब इसका उल्लेख किया है तो सन्देह भी नहीं किया जा सकता।
काकोदर करि रोष सोर करि सन्मुख आयौ।
भई विषमता दूर देखि चरनन सिर नायौ॥
सरनागत निज जानि कृपा करि पावन हेरे।
कर्यौ तमोगुन दूरी सबै सेवक तब टेरे॥
कंठी तुरत मँगाइ तब बाँधी पन्नग के गरे।
भगवत भक्ति प्रभाव यह अंस को ताहि सु लखि परे॥
- पृ० 27, पद-28
एक गृहस्थ भक्त को सदुपदेश :
श्रीरामगोपाल नाम के एक गृहस्थ भक्त थे। वे स्वामी भगवतरसिकजी से विरक्त वेश लेकर वृन्दावन-वास करना चाहते थे। परन्तु भगवतरसिक जी ने उनके अन्दर झाँककर देखा और पाया कि पूर्वजन्मों के संस्कारवश अभी उनके भोग अवशिष्ट हैं, अन्तः करण में वासना के बीज बरकरार हैं। इसलिए उन्होंने रामगोपालजी को बड़े प्रेम से समझाया कि तुम अभी घर में ही रहो। पूर्व जन्म के पुण्यों के पलसवरूप तुम्हारे भोग अभी अवशिष्ट हैं। पहले उन्हे भोगकर क्षीण करो, फिर मेरे पास आना। तुम्हारे हित में इस समय मेरा यही आदेश है।
श्री रामगोपालजी गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य कर घर लौट गये और गुरु-कृपा से संसार के समस्त सुखों का उपयोग करते हुए सुख-शान्ति का जीवन जीते रहे। अन्त में स्वामी भगवतरसिकजी के निकुंजगमन के उपरान्त वे भी वहीं जा पहुँचे।
स्वामी भगवतरसिकजी पहुँचे हुए सन्त थे। वे देह-गेह से ऊपर उठ चुके थे। वे कहते-जाति तो देह की होती है। रसिक अनन्य की कोई जाति नहीं होती। रसिक सन्त तो सबमें अपने हरि-गुरु को ही देखते हैं। उनके अन्दर का समस्त भेद भाव मिट जाता है। उनकी कथनी-करनी में कोई अन्तर नहीं होता। सच्चे रसिक की रहनी का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है। उसे जब भूख लगे तब वह वृन्दावनवासियों के घरों से मधुकरी लेकर क्षुधा की निवृत्ति कर ले--
घर-घर लेइ प्रसाद लगै जब भोजन बाधा।
धोबी के घर से मधुकरी भिक्षा से वैष्णव समाज का विद्रोह एवं वृन्दावन का त्याग :
वे स्वयं भी इसी मधुकरी वृत्ति से रहते थे। एक बार वे वृन्दावन के किसी धोबी के घर से मधुकरी ले आये। मधुकरी लेते हुए उन्हें किसी ईर्ष्यालु साधु ने देख लिया। अपना दाँव लगा देखकर वह उल्टे पाँव स्वामी भगवतरसिकजी के गुरु-स्थान जा धमका। स्वामी ललितमोहिनीदास जी महाराज विराजमान थे। वह उनके सामने ही उबल पड़ा। उन्होंने भगवतरसिकजी को समझा-बुझा देने की बात कहकर जैसे-तैसे उसे शान्त कर दिया। पर बाद में यह बात तूल पकड़ती चली गई।
टटिया-संस्थान में उस समय सभी सम्प्रदायों के साधुओं की सेवा खुले हृदय से होती थी। सभी प्रकार के साधु-सन्त वहाँ आते और निवास करते थे। अतः सबकी प्रसन्नता के लिए वैष्णवों के सामान्य शिष्टाचार का यथासम्भव ध्यान रखा जाने लगा था।
फिर भगवतरसिकजी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के लिए जिसका नाम वहाँ के उत्तराधिकारी के रूप में लोगों की जबान पर चढ़ा हुआ हो, यह आचरण विचारणीय हो उठा। उनसे अकारण ईर्ष्या-द्वेष रखने वाले लोगों की भी कमी न थी। ऐसे लोगों को इसे तूल देने का एक अच्छा अवसर हाथ लग गया।
इधर स्वामी भगवतरसिकजी के लिये यह सिद्धान्त और आदर्श का प्रश्न बन गया। अतः विरोध बढ़ता गया। विरोधी भी भला कब हार मानने वाले थे ? भगवतरसिक-जैसा क्रान्तिकारी और प्रतापी व्यक्तित्व उन्हें बहुत दिनों से खल रहा था। उनके कारण हरिदासी सम्प्रदाय वृन्दावन में अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये हुए था। अतः इस प्रसंग के बाद उन्होंने गुरु-चेला में भेद डालना प्रारम्भ कर दिया। स्वामी ललितमोहिनीदासजी के मन में साधुओं की सेवा के प्रति आग्रह था, इसलिए एक के लिए सबको नाराज कर देना उन्हें उचित प्रतीत नहीं हुआ। वे उनके षड्यंत्र को समझ न पाये और भगवतरसिक जैसे वृन्दावन-निष्ठ अनन्य सन्त को वृन्दावन से बाहर चले जाने का आदेश दे बैठे।
वृन्दावन से प्रयाग के लिए प्रस्थान एवं मार्ग में सिंह पर कृपा :
भगवतरसिकजी को गुरुदेव के इस निर्णय से बहुत दुःख हुआ। दुःख होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि जो अन्यों को वृन्दावन से बाहर जाने से मना करता था, उसी को आज वृन्दावन छोड़ना पढ़ रहा था। वृन्दावन उनके लिए मात्र निवास- भूमि न थी, इष्ट-स्वरूप थी। फिर भी उन्होंने गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य कर बात को और अधिक विकृत होने से बचा लिया। वृन्दावन को अपने हृदय में बसाकर वे यमुना के किनारे-किनारे प्रयाग की ओर चल पड़े।
भगवतरसिक जी ने जब प्रयाग के लिए प्रस्थान किया तब कुछ सन्त भी उनके साथ हो लिए थे, जिनमें रसरंग, बिहारीवल्लभ, मोहनदास आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
मार्ग में घनघोर जंगल आया। मोहनदासजी ने निवेदन किया - "प्रभो, हमने सुना है कि राह में कोई नरभक्षी सिंह रहता है। इसलिए रात-बिरात कोई व्यक्ति इस रास्ते नहीं जाता। हम लोग भी यहीं विश्राम करें। सबेरे प्रस्थान करेंगे।"
मोहनदासजी की बात सुनकर भगवतरसिकजी हँस पड़े और बोले "डरो मत। सारी आशंकाओं को हृदय से निकाल फेंको। भजन के उस महनीय प्रताप को देखो जिसके समक्ष आज नरभक्षी सिंह भी किस तरह श्री हरि के चरणों में नतमस्तक होता है। और वे श्रीबहारीजी महाराज का स्मरण कर आगे बढ़ गए।
सिंह वन में सो रहा था। सहसा कई व्यक्तियों की बतराहट सुनकर वह जागा और क्रुद्ध हो दहाड़ता हुआ उनके सामने आ गया। स्वामी भगवतरसिक जी ने उसे अपना अदभुत रूप दिखाया और हाथ में करुवे का पानी लेकर उसके सिर पर छिड़क दिया। न जाने क्यों, सिंह भयभीत हो वहीं बैठ गया। भगवतरसिकजी ने प्रह्लाद की कथा सुनाकर उसकी सारी विषमता का अपहरण कर लिया। श्रीबिहारीवल्लभ आदि सभी सन्त उनकी जय-जयकार कर उठे और कहने लगे कि इन्होंने तो पीपाजी महाराज को भी मात दे दिया।
प्रयाग स्थित अड़ैल में निवास :
स्वामी भगवतरसिकजी प्रयाग पहुँचे और अड़ैल के समीप यमुना किनारे स्थित एक मढ़ी में निवास करते हुए भजन-भावना करने लगे। तीर्थराज प्रयाग में ही श्रीनिधिवनराज का दर्शन कर वे झूम रहे थे। अपने हृदय को ही उन्होंने वृन्दावन बना लिया था। परन्तु जब कभी वृन्दावन की याद आती थी, उनके मन के तार झंकृत हो उठते थे और बरबस ही उनके कण्ठ से निकल पडता था--
नर्क स्वर्ग अपवर्ग आस नहिं त्रास है।
जहँ राखौ तहँ रहौं मानि सुख रासि है।।
देउ दया करि दान न भूलौं केलि कौ।
भगवत बलित तमाल विलोकों बेलिकौ।।
स्वामी ललितमोहिनी देव को भगवतरसिक की वाणी प्राप्त होना तथा उसे यमुना जी में प्रवाहित करने पर भी ग्रन्थ का न डूबना :
एक वयोवृद्ध सन्त भगवतरसिक जी की वाणी-की एक हस्तलिखित प्रति को अपूर्व निधि बताकर स्वामी ललितमोहिनीदासजी महाराज को भेंट कर गये थे। उन्होंने जब उसे पढ़ा तो वे गद्गद होकर झूम उठे।
वे बार-बार भगवतरसिक जी की सराहना करते, परन्तु जब उनकी दृष्टि अनन्य निश्चयात्म ग्रन्थ (उत्तरार्ध) के ४० वें पद पर पड़ी
चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नाहिं।
सखी लड़ैतीलाल की, रहें महल के माहिं॥
तो वे कुछ संकोच में पड़ गये और यह निर्णय नहीं कर पाये कि इसे अपने शिष्य भक्तों में प्रचारित किया जाय या नहीं। अन्ततः इसी उधेड़बुन में उन्हें नींद आ गई। सबेरे उठे तो यमुनास्नान को जाते समय उसे भी उन्होंने साथ ले लिया और नहाते समय यमुनाजी की धारा में उसे प्रवाहित कर दिया इससे उनका मन थोडा हल्का तो हुआ, पर उसकी अच्छाइयों की याद आते ही वे बेचैन हो उठे। यह एक ऐसा दर्द था, ऐसी चुभन थी कि वे किसी को बता भी नहीं सकते थे।
जैसे-तैसे दिन बीता, रात बीती और सबेरा हुआ। नित्य की भाँति आज फिर वे यमुना स्नान को गए। डुबकी लगाई। पर यह क्या। उन्होंने जैसे ही सिर बाहर निकाला, भगवतरसिकजी की वाणी की वह प्रति जैसी की तैसी उनके सामने आ गई, मानो किसी ने अपने हाथों से उसे लाकर इनके समक्ष रख दी हो। उन्होंने उसे पकड़ लिया और पकड़े ही पकड़े सोचने लगे कि क्या करूँ? द्विविधा मिट नहीं रही थी। शिष्य की वाणी की अच्छाइयों के प्रति अनुराग बढ़ता जा रहा था, परन्तु उसे प्रचारित कर देने पर एक कड़वे सत्य के चिरस्थायी हो जाने का खतरा भी कम न था अन्ततः उन्होंने उसे पुनः यमुनाजी में प्रवाहित कर दिया।
तीसरे दिन भी जब स्वामी ललितमोहिनीदास जी महाराज ने यमुना में डुबकी लगाकर सिर बाहर निकाला तो वाणी की वह प्रति पुनः उनके पास आ गई। चमत्कार तो यह था कि उसका बस्ता तक रंचमात्र भी भीगा न था। उन्हें भी आश्चर्य हो रहा था कि यह वाणी बहकर कहीं डूब क्यों नहीं जाती। वे इसी उधेड़बुन में थे कि श्रीयमुनाजी बोल पड़ीं - "इसमें सत्य की वह आँच है, जिसे मैं भी नहीं पचा सकती। आप इसे ले जाइए। रसिक भक्तों का इससे बड़ा कल्याण होगा। सत्य को स्वीकार करना ही महापुरुषों का काम है। भगवतरसिक आपका है। उसे आशीर्वाद देकर अपनी विशालहृदयता का परिचय दीजिए। ऐसा करने से आपका सुयश निकुंज-मन्दिर में भी सुगन्ध की भाँति फैल जायेगा।"
यमुनाजी का आदेश शिरोधार्य कर उन्होंने उसे अपने हृदय से लगा लिया और शिष्यों में उसके प्रचार-प्रसार का आदेश दे दिया।
स्वामी ललितमोहिनी देव के निकुंज गमन के पश्चात् भगवतरसिक जी द्वारा तटीया स्थान के महंत पद को अस्वीकार करना :
सं 1801 में स्वामी ललितमोहिनीदास जी महाराज के निकुंज प्राप्ति के पश्चात टटिया-संस्थान की गद्दी पर आचार्य स्वरूप से विराजने हेतु प्रार्थना करने के लिए कुछ सन्तों को भगवतरसिकजी के पास भेजा गया था, परन्तु उन्होंने स्पष्ट शब्दों में गद्दी स्वीकार करने से मना कर दिया। जब तक वे सन्त उधर से उनका उत्तर लेकर नहीं लौटे तब तक गद्दी को खाली ही रखा गया था। बाद में उन्हीं के सहयोगी सन्त स्वामी श्रीचतुरदासजी महाराज गद्दी पर विराजमान हुए थे।
रचनाएँ :
भगवतरसिकजी की वाणी में निम्नलिखित चार ग्रन्थ संकलित है:
1. अनन्य निश्चयात्म ग्रन्थ (पूर्वार्ध- उत्तरार्ध),
2. नित्यविहारी जुगल ध्यान,
3. अनन्य रसिकाभरण ग्रन्थ
4. निर्विरोध मनरंजन ग्रन्थ
शिष्य :
स्वामी भगवतरसिक देव के अनेकानेक शिष्य हुए हैं जिनमे रसरंग, बिहारिवल्लभ तथा मोहनदास जी प्रमुख हैं।
देवी देवताओं द्वारा उनके लोक में पधारने का आग्रह एवं निकुंज गमन :
स्वामी भगवतरसिकजी मढ़ी (प्रयाग) में ही भजन-भावना करते हुए सं 1815 में अपने पांचभौतिक शरीर को छोड़कर निकुंज महल के निज परिकर में मिल गये।
श्री बिहारीवल्लभ जी कहते हैं कि स्वामी भगवतरसिकजी जब निकुंज महल में जाने लगे तब गंगाजी प्रकट होकर आईं और बोलीं - "आप शिवलोक को चलें और उसे पवित्र करें !" सरस्वती कहने लगीं - "चतुरानन आपकी बाट देख रहे हैं" यमुनाजी मुस्कराती हुई बोलीं - "चलो वृन्दावन चलें। वहीं निज स्वरूप धारण कर प्रिया-प्रियतम की सेवा में रहना।" देवराज इन्द्र भी अनेक अनेक देवताओं के साथ पधारे और स्तुति करते हुए बोले - "प्रभो ! आप स्वर्ग में पधारें। वहाँ के दिव्य भोगों को भोगते हुए उसे सनाथ करें।"
देवराज इन्द्र की बात सुनकर स्वामी भगवतरसिकजी बोले - "स्वर्ग के सुख तो विनाशी हैं। इसलिए हे देवताओं, हम श्यामा-श्याम के समीप वृन्दावन जायेंगे। वहाँ का सुख अखण्ड और निरतिशय है। वहाँ की दिव्य कुंजनिकुजों में श्रीहरिदासीजी ललनालाल को निरन्तर लाड़ लड़ाती रहती हैं और उनके नित्यविहार का अवलोकन करती हुई सदा लाड़ में भरी रहती हैं। हमारी आस्था उन्हीं हरिदासीजी के चरणों में है इसलिए अब सखी स्वरूप धारण कर उन्हीं के पास जा रहे हैं।" ऐसा कह उन्होंने अपना पांचभौतिक शरीर वहीं छोड़ दिया और सखी-स्वरूप से निज महल में प्रवेश कर गये।
मढ़ी (प्रयाग) में ही इनकी समाधि बनी हुई है, जो सम्प्रति वल्लभसम्प्रदाय के गोस्वामी महानुभावों की देख-रेख में सुरक्षित है।

