अगम अगोचर लीला लाल की - श्री केलि सखी

अगम अगोचर लीला लाल की - श्री केलि सखी

अगम अगोचर लीला लाल की॥
कर्म कराये धराये देह पुनि डारत फाँसी काल की।
काम क्रोध मद लोभ विविध गति दरसावत माया जाल की॥ [1]
करुणा करि पुनि ज्ञान भक्ति दै रेख मिटावट भाल की।
"केलि सखी" कछु रीति निराली शरणागत प्रतिपाल की॥ [2]

- श्री केलि सखी

श्री कृष्ण की लीला जानने में शास्त्र और वेद भी असमर्थ हैं।
पहले तो श्री कृष्ण कर्म बंधन के कारण देह प्रदान करते हैं और फिर मृत्यु का भी विधान कर देते हैं। फिर मनुष्य को काम, क्रोध, मद और लोभ का माया जाल दिखाते हैं। [1]

पुनः श्री कृष्ण करुणा करते हैं और मनुष्य को ज्ञान और भक्ति प्रदान कर उसके कर्म बंधन को तोड़ देते हैं। श्री केलि सखी कहतीं हैं की "शरणागत वत्सल श्री कृष्ण की रीति ही निराली है।" [2]