पलकन सौं रज झारूँ श्रीवन की - श्री ललित विहारिणी जी

पलकन सौं रज झारूँ श्रीवन की - श्री ललित विहारिणी जी

पलकन सौं रज झारूँ श्रीवन की।
विहरत युगललाल मिलि सुख सों
मञ्जुल छाँहि निकुञ्ज सघन की॥ [1]
निर्मल नीर बहत यमुना को,
हरत त्रिविध पीड़ा जन-मन की।
शिव नारद अज सुर सनकादिक
आस करत जित वास करन की॥ [2]
भूरि भाग्य इन ब्रजवासिन के,
छके रहत छबि श्याम-बदन की।
'ललितविहारिणि' देहु कृपा कर
ब्रजबसिवो नित शरण चरण की॥ [3]

- श्री ललित विहारिणी जी

जिस निकुंज वन की सघन कुंजों में श्री श्यामाश्याम सुख पूर्वक विहार करते हैं, उस वृंदावन की रज को मैं अपने आँखों की पलकों से झाड़ूंगा। [1]

उस वन में श्री यमुना जी का निर्मल जल प्रवाहित हो रहा है जो सबके पीड़ा को हरण कर रहे हैं। भगवन शिव, ब्रह्मा, देवगण, सनकादिक ऋषि भी इस वृन्दावन के वास की आशा करते हैं। [2]

ब्रजवासियों का बड़ा सौभाग्य है जो श्री कृष्ण के रूप माधुरी में छके रहते हैं। श्री ललित विहारिणी जी कहते हैं "हे श्री श्यामाश्याम, कृपा कर मुझे श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये और अपने चरणों की शरण में लीजिये।" [3]