मान न कीजै मानिनि वरषा ऋतु आई - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (188)

मान न कीजै मानिनि वरषा ऋतु आई - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (188)

(राग मलार)
मान न कीजै मानिनि वरषा ऋतु आई।
अंग संग मिलि गाउ राधिका, राग-मलार सुहाई॥ [1]
बिनु अपराधहि रूसनौं छाँड़िदै श्रीवृषभान दुहाई।
व्यासस्वामिनी साँवरे-सुंदर, पाँइनि लागि मनाई॥ [2]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (188)

श्री हरिराम व्यास श्री राधारानी से कहते हैं "हे मानिनी श्री राधा, देखिये वर्षा ऋतू आ गयी है, अब मान का त्याग कीजिये। श्री श्यामसुंदर के अंग से अंग मिलाकर राग मलार में हे श्री राधिका, गान कीजिये, जिसकी शोभा अवर्णनीय होगी।" [1]

हे स्वामिनी जू, देखिये तो, सांवरे श्यामसुंदर आपके चरणों का स्पर्श कर आपको मना रहे हैं, बिना अपराध के आपने उनसे क्यों रिस माना, आपको वृषभानु की दुहाई है, अपने मान का त्याग कीजिये। [2]