भक्त प्रकार अनेक विधि, मन-मन औरै बात ।
जे भीजें विपिन-विहार-रस, तिनहिं न और सुहात ॥
- श्री ध्रुवदास, भजन शत (57)
भक्तों के अनेक प्रकार होते हैं और उनके भीतर भक्ति-भाव और साध्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं, पर जो अनन्य भक्त वृन्दावन-युगल-केलि-रस के रसिक होते हैं, उन्हें युगल-विहार के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु रुचिकर नहीं लगती।
जे भीजें विपिन-विहार-रस, तिनहिं न और सुहात ॥
- श्री ध्रुवदास, भजन शत (57)
भक्तों के अनेक प्रकार होते हैं और उनके भीतर भक्ति-भाव और साध्य भी भिन्न-भिन्न होते हैं, पर जो अनन्य भक्त वृन्दावन-युगल-केलि-रस के रसिक होते हैं, उन्हें युगल-विहार के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु रुचिकर नहीं लगती।

