(कवित्त)
रूप के सरोवर में अली कुमुदावली हैं,
लाल हैं चकोर तहाँ राधा मुख चंद हैं। [1]
छवि की मरीचिन सौं सींचत है निस दिन,
कोटि-कोटि रवि-ससि लागैं अति मंद हैं॥ [2]
इक टक रहैं मुख नाम सुख लहैं फिर,
कृपा दृष्टि चहैं सुख रूप नंद-नंद हैं। [3]
जाकौं वेद गावैं मुनि ध्यान हूँ न पावैं,
तै तौ बलि-बलि जावैं हित फँसे प्रेम फंद हैं॥ [4]
- श्री चन्द्रलाल गोस्वामी, भावना पच्चीसी
गोस्वामी चन्द्रलाल जी कहते हैं, "रूप के उस दिव्य सरोवर में सखीगण मानो श्वेत कमल की कलियाँ हैं, श्री कृष्ण चकोर हैं, और श्री राधा का मुख कमल जैसे चंद्रमा है, जिसे देखकर और रस का पान कर श्री कृष्ण जीवित हैं।" [1]
रूप के सरोवर में अली कुमुदावली हैं,
लाल हैं चकोर तहाँ राधा मुख चंद हैं। [1]
छवि की मरीचिन सौं सींचत है निस दिन,
कोटि-कोटि रवि-ससि लागैं अति मंद हैं॥ [2]
इक टक रहैं मुख नाम सुख लहैं फिर,
कृपा दृष्टि चहैं सुख रूप नंद-नंद हैं। [3]
जाकौं वेद गावैं मुनि ध्यान हूँ न पावैं,
तै तौ बलि-बलि जावैं हित फँसे प्रेम फंद हैं॥ [4]
- श्री चन्द्रलाल गोस्वामी, भावना पच्चीसी
गोस्वामी चन्द्रलाल जी कहते हैं, "रूप के उस दिव्य सरोवर में सखीगण मानो श्वेत कमल की कलियाँ हैं, श्री कृष्ण चकोर हैं, और श्री राधा का मुख कमल जैसे चंद्रमा है, जिसे देखकर और रस का पान कर श्री कृष्ण जीवित हैं।" [1]
श्री राधा के मुख कमल की अनुपम छवि सूर्य के समान अपनी कृपा की किरणों से सभी का सिंचन कर प्राणदान कर रही है, जिसके सम्मुख कोटि-कोटि सूर्य और चंद्र भी फीके प्रतीत होते हैं। [2]
श्री नंदनंदन श्री राधा के मुख कमल की कृपा दृष्टि पाने की अभिलाषा में उन्हें एक टक निहार रहे हैं, और प्रेम में सराबोर होकर उनके नाम का निरंतर रटन कर रहे हैं। [3]
जिनके गुणों का गान स्वयं वेद करते हैं, जो मुनियों के ध्यान में भी नहीं आ पाते, वे श्री कृष्ण श्री राधा के प्रेम बंधन में बँधकर स्वयं को उनके प्रेम में न्योंछावर करते रहते हैं। [4]

