श्री अलबेलीअलि जी की जीवनी 

श्री अलबेलीअलि जी की जीवनी 

परिचय :
श्री अलबेलीअलि ललितसम्प्रदाय के स्वनामधन्य कवि हुए हैं। उपासना की दृष्टि से श्री वंशीअलि जी के शिष्यों में वे अग्रगण्य हैं। यद्यपि साहित्यिक क्षेत्र में उनकी ख्याति पर्याप्त समय पहले से हैं, किन्तु उनके जीवन-चरित, काव्य तथा व्यक्तित्व के सूत्र अभी तक पूर्ण रूप से प्रकाश में नहीं आये हैं।
 
आध्यात्मिक जीवन :
अलबेली अलि की निजी उक्तियों से यह सिद्ध होता है कि वे श्री वंशीअलि जी के शिष्य थे।' 'वृन्दावनसत' उनकी आरम्भिक रचना है, जिसका समय 1750 है। अनुमान के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस ग्रन्थ की रचना के समय इनकी अवस्था लगभग 35 वर्ष रही होगी और उन्होंने इस ग्रन्थ की रचना से 5 या 7 वर्ष पूर्व श्री वंशीअलि जी से दीक्षा ली होगी। इस प्रकार इनका दीक्षा समय 1743 के लगभग ठहरता है तथा जन्म 1713। शुक्ल जी ने उनका कविता-काल 18 वीं शताब्दी का अन्तिम समय माना है। इससे भी उक्त अनुमान की सिद्धि होती है। हिन्दी साहित्य के इतिहास-ग्रन्थों में इनका नामोल्लेख हुआ है, परन्तु इनके सम्बन्ध में कोई विशिष्ट सूचना उनमें नहीं दी गयी। केवल उनकी रचनाओं के आधार पर उनका सम्प्रदाय विष्णुस्वामी तथा उनका वंशीअलि जी से दीक्षा लेना ही लिखा गया है। 'वृन्दावनसत' नामक ग्रन्थ में इनके कुछ आत्म-परक कथन मिलते हैं। एक स्थान पर इन्होंने लिखा है :
 
पर्यो हो जगत भव भर्यो अज्ञान सौं विषै-रस-लीन ज्यों मीन सर में।
पर्यो हो ताक तहाँ काल बग ध्यान धरि गिनत हो घरी-पल नाम कर में॥ 
तोरि करि आस और फाँस कलि-काल की मेट कर मान अति नेह भर में।
लीयो गहि बाहु विवि काढ़ि अलबेली वर राष्यो अब आनि वन-कुंज-घर में॥
हे श्री किशोरी जी, मैं भव सिंधु में पड़ा हूँ, मेरे अंदर अज्ञान भरा हुआ है, और मैं विषय-रस के सागर में लीन हूँ जैसे मछली सागर में। काल मुझपर दृष्टि जमाये बैठा है और मेरे हर पल को गन कर मेरे अंत समय का इंतज़ार कर रहा है। हे किशोरी जी, मेरा हाथ पकड़ कर मुझे इस संसार की माया से उबार लीजिये और अपने निज महल का वास प्रदान कीजिये। 
 
अन्यत्र लिखा है :
 
पर्यो जगत भव-कूप में, पर्यो मूढ़ प्रज्ञान।
काठ्यौ निज भुज कुंवरि कर, राष्यो वन सरन आन॥
हे श्री किशोरी जी, मैं भव सिंधु में पड़ा हूँ, मेरे अंदर अज्ञान भरा हुआ है, मेरा हाथ पकड़ कर मुझे इस संसार की माया से उबार लीजिये और अपने निज महल का वास प्रदान कीजिये। 
 
उक्त उद्धरणों में इन्होंने भक्त-जन-सुलभ कथन कर अपनी पूर्वकालीन वृत्ति का संकेत किया है। यद्यपि दास्य भावना में इस प्रकार की उक्तियाँ सहज ही सम्भव होती हैं और उन्हें साक्ष्य के रूप में ग्रहण करना उचित नहीं माना जा सकता, तथापि इससे इतना निश्चय अवश्य होता है कि ये दीक्षा लेने से पूर्व गृहस्थ थे। किन्तु विरक्त होने के पश्चात् ये संसार से नितान्त निःसंग होकर भगवद्भजन में लीन रहने लगे। 'वृन्दावनसत' के अनेक दोहों में इनकी उच्च कोटि की भक्ति-भावना की अभिव्यक्ति हुई है जो सामान्य कवि के द्वारा नहीं लिखी जा सकती। ये निरन्तर प्रेम और रूप के मद में छके रहते थे।
श्री अलबेलीअलि ने अपने गुरु श्री वंशीअलिजी की महिमा का वर्णन अत्यन्त भाव-भीने रूप में किया है। वस्तुतः वंशीअलि जी के व्यक्तित्व के अनुरूप ही इनकी प्रतिभा थी। इनके काव्यों के अध्ययन से इनके फक्कड़पन और मस्ती का सहज ही अनुमान किया जा सकता है। ये बृन्दावन की कुंजों में, यमुना के तट पर डोलते हुए अनन्य भाव से श्री राधा माधव के ध्यान-परायण रहते थे। अन्य बातों की तरह इनके निकुंज-गमन-काल का भी कोई निश्चय नहीं है।
 
संवत दस अरु आठ सै, बरस षष्ठ अरु तीन।
फाल्गुन सुभ सातें बदी, श्री वृन्दावन सत कीन॥
1806 की फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष के सप्तम दिवस के दिन यह "वृन्दावनसत" ग्रन्थ पूर्ण हुआ है। 
 
उनके ग्रन्थों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि श्री वंशीअलि जी के सिद्धान्तों को उन्होंने पूर्णतया आत्मसात् कर लिया था। उनकी वाणी में जो सरसता, शब्द चयन, रस की मादकता और अनन्यता की भावना मिलती है, वह भी वंशीअलि जी की काव्य-गरिमा का स्मरण दिलाती है।
 
अलबेलीअलि जी की वाणी का प्रतिपाद्य :
श्री अलबेलीअलि ने अपनी वाणी में मुख्य रूप से अपनी उपास्या श्रीराधा और उनकी नित्यविहारलीला का वर्णन विस्तार से किया है। इसके अतिरिक्त अपने गुरुदेव और इष्टदेव के प्रति उन्होंने अपनी अनन्य निष्ठा को बड़े सुन्दर रूप में व्यक्त किया है। वृन्दावन जो नित्य-लीला-धाम है, उसके जिस सरस और दिव्य रूप का वर्णन वे कर सके हैं, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। विशेष ध्यान देने की बात यह है कि इन्होंने भी अपने गुरु श्री वंशीअलि जी की तरह श्रीकृष्ण का स्वतन्त्र रूप में वर्णन कहीं नहीं किया। यदि कहीं उनका वर्णन आया भी है तो उनका दास या भक्त रूप ही वर्णित हुआ है। 
 
अलबेलीअलि जी की भक्ति-भावना :
अलबेलीअलि की भक्ति-भावना उच्चतम कोटि की है। श्रीराधा के प्रति की गयी उनकी अनन्य भक्ति उनकी 'विनय कुंडली' तथा 'वृन्दावनसत' नामक रचनाओं में पूर्ण रूप से व्यक्त हुई है। वे कहते हैं
 
अहो कुँवरि बर लाड़िली करुणा-सिन्धु अपार।
तुम बिन नहि मेरी कोऊ कहूँ पुकारि-पुकारि॥
कहूँ पुकारि-पुकारि सुनौ दै काननि प्यारी।
तुम दाता तिहुँ लोक महा हूँ दीन भिखारी॥
देउ यहै वरदान रहूँ पद-पंकज सरना।
और मिटै जग द्वन्द्व तिमिर भ्रम जन मनि भरना॥
'भव-सिन्धु में पड़े हुए भक्त का उद्धार शीघ्र ही करो, मुझे पुकारते पुकारते कितनी देर हो गई है',
 
इत्यादि शब्दों के द्वारा उन्होंने अपनी विकलता को इस प्रकार व्यक्त किया है।
 
बह्यौ जात भव सिन्धु वेगि अब आन गही कर॥
मैं संसार सागर में बहा जा रहा हूँ, हे किशोरी जी, शीघ्र आइये और मेरा हाथ पकड़ लीजिये। 
 
क्वास ! क्वास ! हो स्वामिनी, महाबहु सुख-रासि।
सरनागत प्रतिपाल के पुजवो मन की आस।
पुजवौ मन की आस सबै जो सरनै आयौ।
हौं अति दीन अनाथ तुम्हारे हाथ बिकायौ॥
महा विषे जुग ज्वाल दहत मोहि आन बचायौ।
प्रेम भरे दृग चारु चितै रस सींच जिवावौ॥
हे स्वामिनी, तुम कहाँ हो ? मुझ शरणागत का प्रतिपालन करके मेरे मन की आशा को पूर्ण करो। मैं अत्यन्त दीन और अनाथ हूँ, और तुम्हारे हाथ बिका हुआ हूँ, मैं जगत के विषयों की महाज्वाल में जल रहा हूँ। मुझे आकर बचाओ। अपने प्रेम भरे सुन्दर नयनों से देखकर मुझे सींच कर जिलाओ।
 
भक्त और भगवान् के सम्बन्ध को मेघ और चातक के प्रसिद्ध रूपक से प्रकट करते हुए अलबेलीअलि जी ने कहा है : 
 
रहै सदा चित चौंप त्रिषत ज्यों चात्रक वादी।
जैसे चातक नित्य ही बादलों की और दृष्टि किये वर्षा की प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार भक्त को भगवान की ओर दृष्टि रखनी चाहिए। 
 
विरह-दशा में हृदय के कम्पन सहित अश्रु-वर्षा करते हुए, यमुना के किनारे में पड़े हुए विरह की पीर को उन्होंने कैसे सहन किया, इसका वर्णन इस दोहे में द्रष्टव्य है:
 
चकित नैन कंपत हियौ, महा विरह की पीर।
असुअन मनौं झरना झरै, पर्यौ जमन के तीर॥
ऑंखें चकित हैं, ह्रदय श्री राधा के विरह की पीड़ा से कांप रहा है, मैं श्री यमुना जी के तट पर पड़ा हूँ और आंसू झरने के समान बह रहे हैं। 
 
अपनी अभिलाषाओं का यद्यपि उन्होंने विस्तार से वर्णन किया है, परन्तु यहाँ एक उदाहरण ही दिया जा रहा है :
 
लाभ-हानि जानो न कछु, कौन मान-अभिमान ।
बदन कमल-मकरंद रस, करो नैंन-मग पान ॥ [1]
करो नैंन-मग-पान, सुधा अंग-अंग भरयौ जाके।
घूमत रहौं दिन रैंनि, मनौं मादिक मद-छाके ॥ [2]
निरषि निरषि नव रूप, कुंवरि बर बेस किशोरी ।
बढ़त रहे चित चाय चौंप, जयौं त्रषत चकोरी ॥ [3]

लाभ-हानि, मान-अपमान एवं अभिमान का त्याग कर नित्य ही श्री राधा के वदन कमल के मकरंद रस का नेत्रों से पान करो । जिनके अंग-अंग में प्रेम सुधा रस भरा हुआ है, उनके अंगों के मकरंद रस का पान कर मादक की भाँति उन्मत्त अवस्था में मदमस्त हो दिन-रात उसी रस में डूबे रहो। नित्य नवल किशोरी के नव रूप को निहारते-निहारते चित्त में श्री राधा के लिए प्रेम क्षण-क्षण बढ़ने लगेगा, जैसे चकोर पक्षी चंद्र को देखकर भी तृप्त नहीं होता ।
 
अन्त में वे कहते हैं :
 
मो सौ नहि कोऊ पातकी, तुमसी अधम उधार।
तुम हौ तैसी कीजियौ, अहो रसिक सुकुंवारि॥
अहो रसिक सुकुमारि, करौं बिनती कर जोरै।
बेध्यौ रहै मन रैन-दिना तुव प्रेम के डौरे॥
जो चाहौ सो करौ कुँवरि, त्रिविध तम हरना।
अलबेलीअलि परी आनि, पद-पंकज सरना॥
मुझसा न कोई पातकी है और तुमसा न कोई अधम उधारण, हे रसिक सुकुमारी, आप वही करना जैसा आपका स्वाभाव है (अकारण दया और कृपा करना)। हे श्री राधे, मैं आपसे विनती करता हूँ की मेरा मन दिन-रात केवल आपके प्रेम की डोर से ही बंधा रहे। हे श्री किशोरी जी, मैं आपके चरण-कमलों की शरण में हूँ, मेरे ह्रदय के अंधकार को दूर कीजिये। 
 
अलबेलीअलि जी की गुरु-भक्ति :
श्री अलबेलीअलि ने जहाँ अपने इष्ट में अनन्य भक्ति का वर्णन किया है वहाँ अपने गुरु श्री वंशीअलि जी के चरणों में अपनी अटूट निष्ठा का भी परिचय दिया है। वे श्री वंशीअलि जी को साक्षात् ललिता जी का अवतार मानते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने श्रीराधा और उनमें भेद करके ही नहीं देखा। 
'गुंसाई जी को मंगल' नामक ग्रन्थ में उन्होंने श्री वंशीअलि जी के माहात्म्य का वर्णन विस्तार से किया है। वहां पर उन्होंने श्रीवंशीअलि जी को प्रेम स्वरूपिणी, निकुंज-विलासिनी, ललितावपु, राधिका धन-धनी, आनन्दस्वरूपिणी, इत्यादि अनेक विशेषणों से भूषित किया है। वे अपने गुरुदेव के अनुगत होने पर पूर्ण विश्वास रखते हैं। वे कहते हैं
 
जय जय श्री वंशीअलि गुन जे गाइहैं।
श्री वृन्दावन-वास, कुँवरि पद पाइहैं॥
अरु पावैं रस-रीति जु मुनिजन ना लहैं।
नेति नेति करि वेद जस ब्रह्मादिक कहैं॥
अलबेलिअलि कल केलि सम्पति सकल सहजैं पाइहैं।
जो भी श्री वंशी अली जी के गुणों का गान करेगा वह शीघ्र ही श्री वृन्दावन का वास प्राप्त कर लेगा और श्री किशोरी जी के चरणों को प्राप्त करेगा। उसे मुनियों के लिए भी दुर्लभ श्री राधा रानी के चरण कमलों के रस की प्राप्ति होगी, जिसे वेद भी नेति-नेति कहते हैं और बखान करने में अपनी असमर्थता प्रकट करते हैं। वह सखी देह संग नित्य-विहार रस को सहज ही प्राप्त कर लेगा। 
 
अपने अटूट विश्वास के आधार पर अपने गुरु का गौरव धारण करते हुए वे कहते हैं :
 
श्री वंसीअलि की बलिहारी।
जाके गरब भरे अति निर्भय रहत सदा बनचारी॥
राधा नाम नवल नामावलि सो निस दिन उर धारी।
अलबेलीअलि एक भरोसै सोवत पैर पसारी॥
जिनके गर्व में श्री कृष्ण निर्भय होकर वृन्दावन में डोलते हैं, उन श्री वंशी अली जी पर बलिहारी है। श्री राधा नाम को ह्रदय में धारण कर उसके भरोसे मैं पांव पसर कर सोता हूँ। 
 
उन्होंने तो अपने गुरु के विषय में यहाँ तक कह दिया है कि अनन्य-धर्म का ऐसा वक्ता, कर्ता और अनुमोदन प्राप्त करने वाला कोई दूसरा न अब तक हुआ, न है और न होगा। इससे उनकी अटूट गुरु-भक्ति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
 
अलबेलीअलि जी की वृन्दावन-भक्ति :
श्री अलबेलीअलि की जितनी भक्ति अपनी इष्टदेवी श्रीराधा के चरणों में थी, वैसी ही उनके धाम-रूप श्री वृन्दावन में भी थी। उनके द्वारा रचित 'वृन्दावनसत' भक्ति-साहित्य का एक अनुपम रत्न है। वृन्दावन की महिमा वर्णन करते समय श्री अलबेलीअलि उसकी दिव्य झाँकी प्रस्तुत करते हैं। सिद्धांत विवेचन के प्रसंग में ललितसम्प्रदाय में स्वीकृत वृन्दावन धाम के स्वरूप का वर्णन करते समय उनके उक्त काव्य-ग्रन्थ से कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जा चुके हैं। अतः यहाँ उनकी पुनरावृत्ति करना उचित नहीं है। यहाँ केवल एक-दो उदाहरण देकर वृन्दावन का स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है :
 
अनुराग सों भरी अस रूप गुन षरी अति,
माधुरी विपिन की कौन जानी।
रति-मैंन की सैंन लोटत जहाँ रैन-दिन,
उमा और रमा सब सुधि भुलानी॥
नेत कहि नेत कहि निगम कौं दुर्गम अति,
नारदहि कछु श्री-पति बषानीं॥
परै सोइ आइ अलबेली नैंननि कबै,
राज जहाँ राधिका कुँवरि रानी॥
प्रेम से ओत-प्रोत श्री वृन्दावन की माधुरी भला कौन जान सकता है। काम और रति यहाँ की रज में लोटते हैं, श्री पारवती जी और लक्ष्मी जी दर्शन कर ही अपनी सुधि भूल गयीं हैं। वेद भी जिसे नेति-नेति कहते हैं, जो आगम के अगोचर है, उसका कुछ वर्णन श्री हरि ने देवर्षि नारद को सुनाया था। जहाँ श्री राधिका जी का राज है, ऐसा श्री वृन्दावन मेरे आँखों के समक्ष कब प्रकट होगा। 
 
वृन्दावन में प्रेमोन्मत्त दशा से रहने की अभिलाषा का वर्णन इस प्रकार किया गया है :
 
भरैं दृग वारि उच्चार वन प्रेम सौं,
पूर्ण सोई प्रीति कब होइ मन की।
षान और पान सुख सैंन जो ना मिलैं,
दैव-गति होइ जो हासि तन की॥
दिवस ह्वै जाइ अँग-अंग सत टूक जो,
तजत नहीं सूर ज्यौं भूमि रन की।
होहि तन छीन दुषलीन जो कोटि विधि,
अलबेली जिन जाव रज छाँड़ि बन की॥
आँखों से प्रेमाश्रुपात करते हुए प्रेम में भरकर राधा नाम का उच्चारण करते हुए मैं श्री वृन्दावन में कब डोलूँगा। मुझे वहां खान-पान मिले अथवा न मिले, सुख से शयन मिले अथवा न मिले, मुझे कोई चिंता नहीं, प्रारब्ध वश इस देह की गति जो होनी है सो होगी। मेरे अंगों के सौ टुकड़े ही क्यों न कर दिया जाय, लेकिन जैसे शूरवीर रणभूमि का त्याग नहीं करता वैसे मैं भी श्री वृन्दावन का त्याग नहीं करूँगा। मेरा शरीर क्षीण क्यों न हो जाये, कोटि-कोटि दुःख मिले लेकिन मैं श्री वृन्दावन का त्याग नहीं करूँगा। 
 
अलबेलीअलि जी द्वारा नित्यविहार-वर्णन :
श्री अलबेलीअलि ने नित्यविहार का बड़ा सुन्दर और विस्तृत वर्णन किया है। 'समय प्रबन्ध पदावली' में नित्यविहार के 300  के लगभग पद लिखे गये हैं। ललितसम्प्रदाय के कवियों के उपलब्ध साहित्य में इस ग्रन्थ के आकार का दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं है जिसमें इतने पदों में अष्टयाम की नित्यलीलाओं का वर्णन किया गया हो। इनके वर्णन में एक विशेषता यह भी है कि वह जितना विशद है, उतना ही सरस भी है। इसके अनेक पदों में श्रीराधा के रूप का वर्णन किया गया है तथा अनेक स्थानों पर माधुर्य क्रीड़ा का रसात्मक स्वरूप भी वहाँ उपस्थित है।
 
अलबेलीअलि जी द्वारा श्री राधा के रूप का वर्णन :
अलबेलीअलि जी ने श्रीराधा के रूप का वर्णन विविध प्रकार से किया है। इसके लिये उन्होंने अनेक झांकियाँ प्रस्तुत की हैं। रूप का सांगोपांग वर्णन उस समय किया गया है जब कि श्रीराधा का शृंगार सखियों द्वारा पूर्ण कर दिया जाता है। एक पद में इसका वर्णन बड़े विस्तार से किया गया है। पद का आकार इतना बड़ा है कि उसे यहाँ सम्पूर्ण उद्धृत न कर उसके कुछ अंशों को ही प्रस्तुत किया जा रहा है :
 
बनी नव रसिक-मुकुट-मनि आजु।
अद्भुत रूप-लता मनु फूली, नख-सिख अँग-अँग साजु॥
मज्जन करि सज्जित कच कुसुमित, रंजित बेनी बाम।
मानों कनक-खम्भ के पाछें, लुठत भुअंगिनि स्याम॥
नवल किशोरी श्री राधा की शोभा आज अद्भुत बनी है। श्री राधा का रूप अद्भुत है, नख से शिख पर्यन्त की शोभा बड़ी सुन्दर बानी है। श्री किशोरी जी ने स्नान कर सुन्दर श्रृंगार धारण किया है, गले में पुष्प की माला शोभा पा रही है, वेणी पुष्पों से गुथी हुई ऐसी शोभायमान है जैसे मानों स्वर्ण के खम्बे के पीछे कोई श्याम वर्ण कर सर्प रेंग रहा हो। 
 
अलबेलीअलि जी द्वारा श्री राधा के स्वरुप तत्व का वर्णन :
श्री अलबेलीअलि ने श्रीराधा के स्वरूप का वर्णन ठीक वैसा ही किया है जैसा कि वंशीअलि जी ने किया था। उन्होंने श्रीराधा की महिमा तथा उनके उपास्य स्वरूप का विशद और रोचक वर्णन किया है। अलबेलीअलि के अनुसार श्रीराधा की विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. श्रीराधा परम प्रेम-सुधा-रस-सिन्धु के चद्र के समान सुन्दर और सुकुमार हैं।
2. वे निर्गुण-सगुण-स्वरूपा हैं।
3. वे सुर नर-मुनि द्वारा वंदित हैं। ब्रह्मा-विष्णु-महेश उन पर न्यौछावर करने योग्य हैं।
4. योगी जन निरन्तर उनका ध्यान करते रहते हैं।
5. स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें परम तत्त्व कह कर गुणगान किया जाता है और वे उनके चरणों में जावक लगाकर उन्हें सजाते हैं।
6. उन्हीं श्रीराधा को सखी-गण नित्य दुलराती हैं।
7. वे शरणागत की रक्षा करने वाली हैं, तथा अपार करुणासिन्धु हैं।
8. बे ब्रज-नागरी-चूड़ामणि हैं।
9. वे सुख का सागर और रूप तथा रस की राशि हैं।
अलबेलीअलि ने राधा के रूप का वर्णन विस्तार से किया है। उन्होंने अपनी उपास्या श्रीराधा का ध्यान जिस रूप में किया है, उसका वर्णन राधा-अष्टक में इस प्रकार किया गया है :
 
कनक कंज सौ वदन सुन्दरि निरखि चंद लजावही।
लसत अरुणिम पान की कलि चितै लाल लुभावही॥
श्री राधा के स्वर्ण के कमल पुष्प के समान सुन्दर अंग-प्रत्यंग के दर्शन कर चंद्र भी लज्जित हो रहा है। अधरों पर पान की लालिमा का दर्शन कर श्री कृष्ण का चित्त भी आसक्त हो रहा है। 
 
रचना :
श्री अलबेलीअलि की कुल 7 रचनाएँ अब तक उपलब्ध हुई हैं। इनके नाम निम्नलिखित हैं :
1. गुसाईं जी कौ मंगल
2. समय प्रबन्ध पदावली
3. श्री गुरु-परम्परा
4. वृन्दावन सत
5. श्री राधाष्टक
6. प्रिया जी कौ मंगल
7. विनय कुंडली
 
उपर्युक्त ग्रन्थों में 'गुरु-परम्परा' संस्कृत की रचना है तथा शेष रचनाएँ हिन्दी में हैं।