ते अनन्य निजु जान, जे श्रीस्वामी हरिदास के।
मनें न आने आन, विनु निकुँज रस माधुरी ॥
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (655)
वास्तव में वही श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के अनन्य निज-जन हैं, जिनका हृदय श्यामा-श्याम की अद्भुत निकुंज-रस-माधुरी के अतिरिक्त और कुछ स्पर्श नहीं करता। उनका चित्त अखंड नित्य-विहार के रस में ही स्थित रहता है।
मनें न आने आन, विनु निकुँज रस माधुरी ॥
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (655)
वास्तव में वही श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के अनन्य निज-जन हैं, जिनका हृदय श्यामा-श्याम की अद्भुत निकुंज-रस-माधुरी के अतिरिक्त और कुछ स्पर्श नहीं करता। उनका चित्त अखंड नित्य-विहार के रस में ही स्थित रहता है।

