जाकी प्रभा अवलोकत ही तिहूँ लोक कि सुन्दरता गहि वारि।
कृष्ण कहैं सरसीरुह नयन को नाम महामुद मंगलकारी॥ [1]
जा तन की झलकैं झलकैं हरि ता द्युति स्याम की होत निहारी।
श्री वृषभानु कुमारि कृपा करि राधा हरो भव बाधा हमारी॥ [2]
- ब्रज के सवैया
जिनकी अंग कांति का दर्शन करते ही तीनों लोकों की समस्त सुंदरता भी न्यौछावर हो जाती है, उन कमल नयनी श्री राधा का नाम महामोद और मंगलकारी है, ऐसा श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं। [1]
कृष्ण कहैं सरसीरुह नयन को नाम महामुद मंगलकारी॥ [1]
जा तन की झलकैं झलकैं हरि ता द्युति स्याम की होत निहारी।
श्री वृषभानु कुमारि कृपा करि राधा हरो भव बाधा हमारी॥ [2]
- ब्रज के सवैया
जिनकी अंग कांति का दर्शन करते ही तीनों लोकों की समस्त सुंदरता भी न्यौछावर हो जाती है, उन कमल नयनी श्री राधा का नाम महामोद और मंगलकारी है, ऐसा श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं। [1]
जिनकी दिव्य झलक की अलौकिक शोभा को निहारते ही श्री कृष्ण आनंद से उल्लसित हो उठते हैं, वे वृषभानु कुमारी श्री राधा हमारी समस्त भव-बाधाओं का हरण करें। [2]

