राधा मम नैन-प्रान, राधा सुख-सम्पत्ति है,
राधा मुख-कमल मेरे हियको आधार है। [1]
धर्म पूज्य लोक इष्ट मित्र वेद राधा ही,
राधा कौ नाम मेरी रसना उचार है॥ [2]
राधा बिन जानौं हौं जो पै और काहू कों,
तौ पै मन लाखि लाखि लाखि कुलगारि है। [3]
राधा ही साधन फल, सिद्ध 'बंशी' राधा ही,
मेरे मन चाह श्रीराधा कौ उगार॥ [4]
- श्री वंशी अली जी, हृदय सर्वस्व (47)
श्री राधा ही नित्य मेरी दृष्टि में हैं और वे ही मेरी प्राण, सुख संपत्ति हैं, श्री राधा का मुख कमल ही मेरे ह्रदय का आधार है। [1]
श्री राधा ही मेरा धर्म हैं, मेरी पूज्य हैं, मेरी इष्ट, मित्र और वेद भी श्री राधा ही हैं, मेरे मुख से उन्हीं के पवित्र नाम का उच्चारण होता रहता है। [2]
यदि श्री राधा के अतिरिक्त मैं किसी और को जानूँ तो मेरे साथ मेरे कुल को लाखों लाखों धिक्कार है। [3]
श्री वंशी अली जी कहते हैं "मेरी साधना का फल श्री राधा ही हैं, मेरी सिद्धि भी श्री राधा ही हैं, मेरे मन को श्री राधा के मधुर प्रेम की ही चाह है "। [4]

