चरनकमल रज सेइहौं, मन-बच-क्रम यह आस ।
अपनों सर्बस जानि कैं, बलि जाइ नागरीदास ॥
- श्री नागरिदेव जू, श्री नागरिदेव जू की वाणी (1)
मेरे तन-मन-प्राण और रोम-रोम का सर्वोच्च सर्वस्व तो श्री बिहारी-बिहारिन के चरण-कमलों की रजस्वरूप श्री वृन्दावन ही है। मैं मन, वचन और कर्म से दृढ़ अनन्य भाव रखकर निरंतर उसी का सेवन करता हूँ, उसी को अपना सर्वस्व मानता हूँ और उसी पर बार-बार बलिहारी जाता हूँ।
अपनों सर्बस जानि कैं, बलि जाइ नागरीदास ॥
- श्री नागरिदेव जू, श्री नागरिदेव जू की वाणी (1)
मेरे तन-मन-प्राण और रोम-रोम का सर्वोच्च सर्वस्व तो श्री बिहारी-बिहारिन के चरण-कमलों की रजस्वरूप श्री वृन्दावन ही है। मैं मन, वचन और कर्म से दृढ़ अनन्य भाव रखकर निरंतर उसी का सेवन करता हूँ, उसी को अपना सर्वस्व मानता हूँ और उसी पर बार-बार बलिहारी जाता हूँ।

