परिचय :
'रसिक अनन्य परिचई' में अनन्यअलि के सम्बन्ध में कहा गया है -
श्री गुरु गोविन्द लाल धाम लीला जब कीनी।
लाइक सबविधि जानि टहल प्रभु गृह की दीनी॥
सो आज्ञा प्रतिपाल करी अति भक्ति सचाई।
देह अन्त परजन्त बंक गति सौं रसिकाई॥
हित पद्धति के भजन बिनु सुमति न रंचक जाहि चलि।
श्री व्यास सुवन पथ बाँकुरे बाँकी अति निपट अनन्य अलि॥
चाचा हित वृन्दावनदासजी कहते हैं कि अनन्यअलि के गुरु श्री गोविन्दलाल गोस्वामी ने अपने लीला प्रवेश के समय इनको पूर्ण योग्य समझकर अपने परिवार की सेवा में नियुक्त किया था। अनन्यअलि ने इस गुरु-आज्ञा का अपने जीवन के अंत तक भक्तिभावपूर्वक पालन किया। ये अपने भजन में श्री हित-पद्धति का पूर्ण रूप से अनुसरण करते थे। श्री अनन्यअलि श्री हिताचार्य के भक्ति-पथ के अनन्य अनुयायी थे।
श्री अनन्यअलि जी का जन्म अनुमानतः 1683 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका पूर्वनाम भगवानदास था। इनके घर में पहले से ही श्री राधावल्लभीय उपासना चली आ रही थी। इनके बड़े भाई श्री हितजी महाराज की भजन पद्धति का आश्रय लेकर सिद्धावस्था को प्राप्त हुए थे। श्री वृन्दावन में अनन्यअलि जी श्री ध्रुवदासजी की कुटी के समीप रहते थे और जीवन के अन्त तक वहीं रहकर भजन करते रहे। ये स्वभाव से अक्खड़ थे और अपने सिद्धान्तों के साथ किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं थे। अनन्यअलि जी श्री हिताचार्य के द्वितीय पुत्र श्रीकृष्णचन्द्र गोस्वामी के वंशज गोस्वामी गोविन्दलालजी के शिष्य थे।
आध्यात्मिक जीवन :
श्री अनन्यअली के प्रारंभिक जीवन का कुछ परिचय इनकी एक रचना 'स्वप्न-प्रसंग' से प्राप्त होता है। इसमें इनके पन्द्रह 'स्वप्न' संगृहीत है। इनमें से प्रथम नौ प्रसंगों में इन्होंने अपने सम्बन्ध में चर्चा की है। प्रथम प्रसंग में इन्होंने बताया है कि ये आठ वर्ष की अवस्था में अपने देश में ही श्री गोविन्दलाल जी के शिष्य हो गये थे। और इन्होंने श्री हितचौरासी के पद उस अल्प आयु में ही कण्ठ कर लिये थे। ये पाँचों पद रास के है 'वेनु माई बाजे वशीवट’ (पद स. 64), ‘मोहन मदन त्रिभंगी’ (पद सं. 63), 'आज नागरी किशोर भावती विचित्र जोर कहा कहो अंग-अंग परम माधुरी’ (पद स. 10), ‘आज देख सुन्दरी मोहन बनी केलि' (पद सं. 17), ‘मदन मथन घन निकुंज खेलत हरि राधा रुचिर’ (पद सं. 65)। इन्होंने एक पद स्फुटवाणी का कंठस्थ किया था - ‘रहो कोऊ काहू मनहि दिये’ (पद सं. 20)। इन्होंने लिखा है कि “मैं खेलते समय इन्हीं पदों का गान करता था और दूसरे बालकों से भी यही गवाता था। चलते-फिरते उठते-बैठते बालकों संग यही पद गाता था। जब मैं पढ़ने जाता तो वहां भी इन्हीं पदों को गाता और दूसरों से गवाता, यहीं पद लिखता और पढ़ता, दूसरों को भी यही पढ़ाता।”
स्वप्न में किसी के द्वारा वृन्दावन चलने का आग्रह करने का प्रसंग :
द्वितीय प्रसंग में अनन्यअली ने बताया है कि इसके बाद इन्होंने श्री ध्रुवदासजी की 'बयालिस लीला' में से 'श्री वृन्दावनशत' कण्ठ किया और सोते-जागते, उठते बैठते उसी को रटते रहे। इस स्थिति में दो वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन स्वप्न में इनको किसी ने आवाज देकर जगाया और कहा कि भगवानदास, श्री वृन्दावन चल। उसके बाद यह स्वप्न इनको बार-बार दिखाई देने लगा | स्वप्न में कोई इनकी कोठरी के किवाड़ों पर दस्तक देकर इन्हें जगाता, ये चौककर जाग उठते और किवाड़ खोल देते। ऐसी घटना प्रतिदिन होते देखकर इनकी माता और भ्राता को चिन्ता हो गयी। भगवानदास जी ने उनको बताया कि प्रतिदिन मुझसे कोई वृन्दावन चलने को कहता है। इनकी माता को विश्वास नहीं हुआ और वे यह मानने लगी कि उनका लड़का पागल हो गया है। किन्तु इनके बड़े भाई श्रीजी के कृपापात्र थे। वे इनकी दशा देखकर शांत बने रहे और इन पर श्रीजी की कृपा मानते रहे। अनन्य अलिजी ने लिखा है कि जब तक ये श्री वृन्दावन नहीं पहुँच गये, तब तक इन्हें इस प्रकार के स्वप्न बराबर आते रहे।
स्वप्न में बड़े भाई का सखी रूप में आना और एक पद कंठस्थ करवाने का प्रसंग :
तीसरे प्रसंग में अनन्यअलि जी ने बताया है कि मेरे भाई ने मुझे पूरी हित-चौरासी कण्ठ करायी, किन्तु चौरासीजी का एक पद 'चलहि किन मानिनि कुञ्ज कुटीर' (पद सं. 37) मुझे किसी तरह भी कण्ठ नहीं हुआ। जब तक मैं बीस बरस का हुआ, तब तक 83 पदों का ही पाठ करता रहा।
मेरी आयु के बीसवें वर्ष में मेरे भाई ने शरीर छोड़ा। जब मेरे भाई का शरीर छूटने का समय आया तब उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि भगवानदास से कुछ कहेंगे ? भाई ने कहा कि मैं उससे क्या कहूँ, मैं सिर्फ इतना ही कहता हूँ कि यह श्रीजी का भजन करता रहे। अर्द्धरात्रि के समय भाई ने मुझे जगाकर कहा कि मुझे हित चौरासीजी का पाठ सुनाओ। मैं धीरे-धीरे पाठ करने लगा और सवेरे तक पाठ करता रहा। सबेरा होते ही भाई ने मुझसे कहा कि मेरा शरीर अब छूटनेवाला है। यह कहकर वे खाट पर से नीचे उतरे, स्नान किया, महाप्रसाद लिया और मुझसे कहा कि तुम धुवदासजी की धमार- 'देख सखी नवकुंज राधा लाल बने री' मुझे गाकर सुनाओ। यह धमार उन्होंने स्वयं भी गाई और अपने कृपापात्रों से भी गवाई। इस धमार को गाते-गाते उनका शरीर छूट गया और वे सखीस्वरूप प्राप्त करके निकुंज महल में प्रवेश कर गये।
सब लोग भाई के पार्थिव शरीर को ले जाकर उसका दाह संस्कार कर आये। उनके सब कृपापात्र उस दिन हमारे घर ही रहे और अर्धरात्रि तक सबने मिलकर नाम-संकीर्तन किया। उसके बाद सब लोग सो गये और उनके साथ मैं भी सो गया। जब रात्रि एक पहर शेष रही तब आठ सखियों ने आकर मुझे जगाया। मैंने स्वप्न में ही उनसे कहा कि तुम लोग कौन हो और कहाँ से आयी हो। उनमें से एक सखी हँसकर बोली कि मैं तो तेरा भाई हूँ। मैंने उनसे पूछा कि तुम्हारा ऐसा स्वरूप कैसे हो गया तो उन्होंने कहा कि अब हमारा यही स्वरूप है। तू उठ बैठ मैं तुझे चौरासीजी का वह पद याद कराता हूँ जो तुझे किसी तरह याद नहीं हो रहा था। यह कहकर उन्होंने 'चल किन मानिनि कुञ्ज कुटीर' वाला पद मुझे कंठ करा दिया। उसके बाद में जाग उठा और रुदन करने लगा। कृपापात्रों ने मुझसे पूछा कि भाई, तुम रोते क्यों हो? तुम्हारे भाई जब मरे तब तो तुम रोये नहीं, किन्तु अब क्यों रो रहे हो? जैसे-जैसे सब लोग मुझसे रोने का कारण पूछते थे, वैसे वैसे ही मेरी छाती फटी जाती थी और मैं रोते-रोते श्वास भी नहीं ले पा रहा था। मेरी यह दशा देखकर सब लोगों ने कहा कि अब ये भी बचेंगे नहीं। मैंने उन लोगों से कहा कि न तो तुम मुझसे बोलो और न ही मेरे पास आओ। मैं इसी तरह तीन दिन तक रोता रहा और कुछ खाया-पिया नहीं। चौथे दिन मेरा भावावेश कुछ कम हुआ और सब लोगों को शान्ति मिली।
स्वप्न में श्री हितजी महाराज के समाधि मंडल, श्रीजी के मन्दिर और यमुनाजी के दर्शन होने का प्रसंग :
चतुर्थ प्रसंग में श्री अनन्यअलि जी ने बताया है कि "भाई की मृत्यु के बाद मुझे फिर वही स्वप्न आने लगा जिसमें कोई मुझसे श्री वृन्दावन चलने को कहता था। अपने देश में ही एक दिन मुझे स्वप्न में श्री हितजी महाराज के समाधि मंडल तथा श्रीजी के मन्दिर और यमुनाजी के दर्शन हुए। थोड़े दिनों के बाद हमारे गुरुचरण श्री गोस्वामी गोविन्दलालजी महाराज हमारे गाँव में पधारे। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम अपना विवाह मत होने देना, हम तुम्हें श्री वृन्दावन ले जायेंगे और वे मुझे श्रीवृन्दावन ले आये।"
स्वप्न में श्री प्रिया जी संग सखियों के दर्शन होने का प्रसंग :
पंचम प्रसंग में अनन्यअली जी ने बताया है कि ये 1702 ज्येष्ठ कृष्णा द्वितीया को श्री वृन्दावन पहुँचे थे। उस समय श्री राधावल्लभलाल आजानगढ़ (कामवन) में विराजते थे। अनन्यअलि जी के श्री वृन्दावन पहुँचने के लगभग 25-26 वर्ष पूर्व बादशाह औरंगजेब की आज्ञा से श्री राधावल्लभजी का मन्दिर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया था। कामवन में इन्होंने देखा कि सेवा में केवल श्री श्यामसुन्दर का स्वरूप विराजमान है और उनके निकट केवल एक गादी बच रही है। "सम्प्रदाय में श्री राधा की प्रधानता होते हुए भी सेवा में उनका प्रकट रूप न देखकर मैं द्विविधा में पड़ गया। उस दिन रात्रि को जब में सोया तब मैने देखा कि मैं मन्दिर में जगमोहन के खड़ा हुआ दर्शन कर रहा हूँ। दूसरे क्षण में ही मैंने देखा कि श्री राधा की गादी से कोटि-कोटि दामिनी को लज्जित करने वाला श्री प्रिया जी का स्वरूप प्रकट हो गया। श्री लाड़िलीजी ने मुझे हँसते हुए संकेत करके अपने पास बुला लिया और में निज मन्दिर (गर्भमन्दिर) सिंहासन के पास जाकर खड़ा हो गया। मैंने अन्दर जाकर देखा कि मेरे भाई भी सखीरूप में वहीं पर खड़े हुए हैं। उन्होंने मुझे डाँटते हुए कहा कि तू मन्दिर के अन्दर क्यों आ गया ? मैंने कहा कि मैं तो लड़ैतीजी के बुलाने से आया हूँ। लड़ैतीजी ने भी मन्द-मन्द मुस्कराकर कहा कि यह तो हमारा है। सबेरे जब मैं सोकर उठा तो डेढ़-दो घण्टे तक रोता रहा।
सेवाकुंज में स्वप्न में श्री राधा के दर्शन होना :
एक बार अनन्यअली जी सेवाकुंज में अन्न जल त्यागकर तीन दिन तक सघन वृक्ष के नीचे बैठे रहे। चौथे दिन रात्रि को स्वप्न में श्री राधा ने उनसे कहा कि, 'तू हठ मत कर, हम तो तेरे हृदय में नित्यक्रीड़ा करते रहते हैं। तू अपनी कुटी में जाकर प्रसाद ग्रहण कर।" इसके बाद ये जाग पढ़े और अपने को कृपा का अनाधिकारी समझकर रुदन करने लगे। प्रातः काल होने पर कुछ रसिक भक्त इनको ढूँढते हुए सेवाकुंज में पहुंचे और उन्होंने भी इनसे यही कहा कि इस धर्म में हठ करने से कोई काम नहीं बनता है। इस तरह से इनको समझा-बुझाकर ये वहाँ से उठा लाये।
दुष्ट अन्न-भक्षण के प्रभाव का प्रसंग :
दसवें और ग्यारहवें प्रसंग में अनन्यअलि जी ने दुष्ट अन्न-भक्षण के कुप्रभाव का एक उदाहरण दिया है। इनके गुरु श्री गोविन्दलाल गोस्वामीजी की एक वैश्याणी शिष्या थी। उसके पिता और भाई बादशाह औरंगजेब की नौकरी में थे। वैश्याणी अनन्यअलिजी से कुछ भेंट स्वीकार करने का आग्रह करती रहती थी किन्तु ये उसके घर में म्लेच्छों का धान्य समझकर स्वीकार नहीं करते थे। ये उससे कहते रहते थे कि 'बीबी, तेरे यहाँ म्लेच्छों का धान्य है। उसको खाने से हृदय मलिन होता है, भजन-भावना क्षीण होती है और इष्ट से विमुखता हो जाती है। किन्तु वह वैश्याणी इनके पीछे पड़ी ही रही और निरन्तर आग्रह करती रही। निरुपाय होकर उसने एक दिन अपनी गुरुमाता के यहाँ खीर की रसोई कराई और उनको शपथ दिला दी कि आप भगवानदास को यह न बतायें कि यह खीर मैंने भोग लगाई है और उसको प्रसाद खिला दें। अनन्यअलि जी जब माताजी के पास प्रसाद ग्रहण करने पहुंचे तो उन्होंने इनको खीर भी परोसी। अनन्यअलिजी ने पूछा कि यह किसका मनोरथ है तो माताजी ने कह दिया कि यह मेरे द्वारा ही बनाई गई है। तुम कोई विचार न करके आनन्दपूर्वक प्रसाद ग्रहण करो।
रात्रि को जब ये सोये तो स्वप्न में देखा कि ये दिल्ली के कोट के एक द्वार पर खड़े हैं और इनके हाथ में शौच जाने के लिए मिट्टी का पात्र है। थोड़ी ही देर में इनको एक सवारी सामने से आती दिखाई दी। इन्होंने लोगों से पूछा कि यह किसकी सवारी है तो उन्होंने कहा कि तुम पहचानते नहीं हो ये बादशाह औरंगजेब हैं। इन्होंने देखा कि चारों ओर से फौज चली आ रही है और बादशाह एक पालकी में बैठा हुआ है। उसकी सफेद लम्बी दाढ़ी है, भारी गर्दन है और उसने सफेद सादे वस्त्र पहन रखे है। उसके सामने कुरान की प्रति रखी है जिसको वह पढ़ता जा रहा है। यह सब देखकर ये घबड़ा गये और इनकी आँख खुल गयी।
दूसरे दिन जब ये गुरुजी के यहाँ प्रसाद पाने गये तब इन्होंने माताजी से पूछा कि आप मुझे सच-सच बतलाइये कि खीर किसने बनवायी थी ? माँजी ने कहा कि पहले तुम यह बतलाओ कि तुम्हें उसका क्या प्रभाव दिखलायी दिया ? अनन्यअली जी ने उनको औरंगजेबवाला पूरा स्वप्न सुना दिया। उसे सुनकर माँजी को बहुत कष्ट हुआ और उनके नेत्रों में जल भर आया। उन्होंने वैश्याणी को बुलाकर बहुत डाँटा और उससे कहा कि तू अपने अपराध के लिये क्षमा माँग। वैश्याणी घबड़ा गयी और भविष्य में ऐसा कोई कार्य न करने की शपथ ली। ग्यारहवें प्रसंग में इन्होंने अन्न-दोष का एक अन्य उदाहरण दिया है।
वैष्णव को कठोर वचन बोलने के दुष्परिणाम का प्रसंग :
बारहवें प्रसंग में अनन्यअलि जी ने कठोर वचन बोलने के दुष्परिणाम को अपने जीवन की एक घटना से उद्धृत किया है। इन्होंने बताया है कि एक दिन मैंने श्रीजी के कृपापात्र श्यामदास गुजराती से बहुत कर्कश वचन कहे। मैंने उसको डाँटते हुए कहा कि तू दिनभर सोता रहता है, भजन बिलकुल नहीं करता है। यह बड़ी अनुचित बात है। तुझे श्रीजी का नाम लेना चाहिए, वाणी का पाठ करना चाहिये और सोना नहीं चाहिए। मेरे डाँटने से श्यामदास के मन में बड़ा कष्ट हुआ और इस अपराध से मुझे रात्रि में यमराज के दर्शन हुए। मैंने एक महाभयानक स्वरूप को आकाश से धनुष-बाण लिये हुए अपनी ओर दौड़ते हुए देखा। मैं बहुत डरा और उससे बचने के लिए भागने लगा। मैं जितना दौड़ता था, उसको अपने सामने पाता था। घबड़ाहट में मेरी आँख खुल गयी। मैं उठकर सीधा श्यामदास के पास गया और उसके चरणों में अपना मस्तक रखकर अपने अपराध की क्षमा माँगी।
मानसी सेवा का प्रसंग :
पन्द्रहवें और अन्तिम प्रसंग में अनन्यअलि जी ने बताया कि एक दिन इनको बहुत जोर से ज्वर आया और ये अचेत हो गये। ये मानसी सेवा किया करते थे। अचेतावस्था में उस दिन रात के समय श्री लड़ैतीलाल को मानसी सेवा में ब्यालू करवाना भूल गये। अर्द्धरात्रि के बाद किसी ने इनकी कुटी में पुकारकर कहा कि 'अनन्यअलि, तू उठ और हमें ब्यालू करा। हम बहुत देर से बैठे-बैठे तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। स्वप्न में यह बात सुनकर ये जाग उठे और मन को सावधान करके मानसी में शयन-भोग अर्पण किया।
रचना :
श्री अनन्यअलि जी की वाणी का विपुल विस्तार है। इनकी छोटी-बड़ी 80 रचनाएं प्राप्त है। इनमें से सबसे छोटी 'जीविका को नेम' चार छन्दोंवाली है तथा सबसे बड़ी 'श्री हित हरिवंश जू की नामावली' में 351 दोहे हैं। उनकी वाणी के कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते हैं -
जुगल भजन की हाट करि, ऐसी विधि ब्यौहार।
रसिकन सौं सौदा बनै, चर्चा नित्यविहार॥
चित डाँडी पलरा नयन, प्रेम डोर सौं बानि।
हियौ तराजू लेहु कर, तौल रूप मन सानि॥

